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रविवार, 29 जून 2025

कलयुग जीवन की महान गाथा .....और जीवन बीत गया

में अनार्थ आश्रम में चारपाई बेठा था। पास ही मेरे बुढ़ापे का साथी डंडा था। मैं अपने जीवन के बीते हुए दिनों के बारे में कुछ सोच रहा था। हालांकि मेरा जीवन शुरू से ही संघर्ष भरा रहा है। मैं अपने माता-पिता का अकेली संतान था। बचपन में पिताजी गुज़र जाने के कारण मां के कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। आर्थिक परिस्थितियों भी बहुत कमजोर थी। जैसे तैसे गुजारा कर मां ने मुझे पढ़ाया लिखाया उच्च माध्यमिक में पढ़ाई जारी हुई थी। कि मेरी मां की भी मृत्यु हो गई। अब मैं अकेला बचा था। हालांकि मेरे ताऊ, चाचा थे। किंतु कोई किसी का साथ नहीं देता है। सभी अपने परिवार और कार्य में मस्त थे। लेकिन कहते हैं ना की- गरीबी बुरा वक्त किसी से नहीं मिलता है। साथ फिर भी रहती है। केवल एक ही आश परमात्मा!
लेकिन फिर भी मैंने हौसला नहीं छोडा़ पढ़ाई और घर का काम जारी रखा।
धीरे-धीरे मैंने B.A पास कर ली। लेकिन अभी तक नौकरी का कोई चांस नहीं था। आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए रुपए पैसों की जरूरत थी। जो मेरे पास पर्याप्त नहीं थे। इसलिए मैंने सोचा कि क्यों ने छोटा-मोटा काम धंधा या किसी के यहां काम कर आगे की पढ़ाई जारी रखी जाए। ''मरता क्या नहीं करता''Aaa
गांव से शहर की तरफ चल दिया। काम की तलाश करते हुए एक कपड़े की दुकान पर काम मिल गया। दिन में कपड़े की दुकान पर ग्राहकों को कपड़े दिखाना पैक करना। ग्राहकों को देना था। और रात को पढ़ाई जारी रखना था। धीरे-धीरे मैंने b.Ed की परीक्षा पूरी कर ली। वह भी अच्छे अंकों के साथ। वैकेंसी निकली और थर्ड ग्रेड टीचर भर्ती की परीक्षा दी। फिर अपने कार्य में लग गया। कुछ दिनों में रिजल्ट जारी होने वाले थे। मेरे मन में यह विश्वास नहीं था। कि मेरा भी सिलेक्शन हो सकता। किंतु मनुष्य पूरी लगन मेहनत और विश्वास के साथ कोई किया गया कार्य असफल नहीं हो सकता। और मेरा सिलेक्शन थर्ड ग्रेड टीचर के रूप में गांव के ही पास वाले गांव मे ड्यूटी लग गई । अब जरूरत थी। केवल गृह संगिनी की कहते हैं कि एक दूसरे का सुख - दुख: बांटने वाला कोई ना कोई होना चाहिए ।लेकिन व्यक्ति के पास नौकरी आने से पैसा और पैसा आने पर मेल- मिलाप करने वाले व्यक्तियों की भी कमी नहीं होती। एक नहीं चार-चार रिश्ते घर बैठे आ रहे थे। देहज में कोई क्या दे रहा था। तो कोई क्या दे रहा था।
लेकिन मैं दहेज का लोभी ने होकर पारिवारिक, सुशील और संस्कारी गृह संगिनी चाहता था। जिस गांव में मैं पढाने जाता था। उसी गांव की राधा नाम की लड़की से मैंनें शादी कर ली जो एक गरीब किसान की लड़की थी। जो गुण में चाहता था। वह उसमें कूट-कूट के भरे हुए थे।
राधा घर का काम मैं पढ़ाने जाता था। जीवन बहुत आनंद से गुजर रहा था। धीरे-धीरे शादी को 3 साल बीत चुके थे।डॉक्टर को भी दिखाया,मंदिर पूजा,झाडा- फूकीं, दान - दक्षिणा आदि सभी मन्नते करने के बाद
अभी तक घर में बच्चें की किलकारियों की आवाज नहीं गूंजी थी। गांव की औरतें कई तरह की बातें बनाती। जिससे राधा का मन बहुत दुखी होता था।
और वह मुझसे कहने लगती थी।क्या मेरे कभी बच्चे होगे या नहीं होगे या मैं इसी तरह की बातें जीवन भर सुनती रहूंगी। मैंने आश्वासन देते हुए कहा कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन बहुत दिनों बाद भगवान ने हमारी सुन ली। राधा ने अपने एक बच्चे को जन्म दिया। खुशी से पूरी बस्ती को भोजन कराया पंडे - पुजारी को दान-दक्षिणा  आदि। राहुल को पढ़ने लिखने में किसी चीज की कमी नहीं आने दी। बड़ा होने पर डिप्लोमा डिग्रियों के नाम से खूब पैसा खर्च किया । लेकिन अभी तक सरकारी/ प्राइवेट किसी भी तरह की नौकरी नहीं लगी थी। मैंने सोचा क्यों नहीं अच्छी लड़की देख कर इसकी शादी कर दी जाए। कुछ दिनों में भी शिक्षक की नौकरी से रिटायरमेंट होने वाला हूं। राहुल से बात भी की लेकिन उसने बताया। कि मैं अपने कॉलेज में पढ़ने वाली नेहा मेरी फ्रेंड है। उससे शादी करना चाहता हूं। राधा ने बहुत समझाया कि बेटा किसी गांव की लड़की शादी कर लो। लेकिन उसने एक ने मानी मुझे मजबूर होकर शहरी लड़की से शादी करनी पड़ी। पहले तो बहू में किसी तरह की कमी नजर नहीं आई। समय पर चाय, नाश्ता, खाना टाइम पर देती थी। शायद मेरी बहू के बारे मे सोच गलत थी। सब कुछ अच्छे से चल रहा था। राधा जो राहुल की मां बीमार रहने लगी। डॉक्टर से दिखाने पर पता चला कि। उसको लिवर कैंसर है। बीमारी में पड़े रहने पर उसकी बहू राधा को खरी - कोठी सुनाती रहती थी। कि- कितना पैसा बर्बाद कर दिया। बहुत इलाज करवाने के बाद भी ठीक नहीं हो पाई और एक दिन भगवान को प्यारी हो गई। मेरा जो रिटायरमेंट का पैसा मिला था। उनको राहुल आज यह काम है, कल वह काम है। के नाम पर पूरे पैसे मेरे अकाउंट से निकल चुका था। मेरा शरीर अब इतना काम नहीं देता था । जितना कि पहले राहुल को भी अभी तक किसी तरह की नौकरी नहीं मिली थी। बहु जो सुबह शाम राहुल से लड - लड़कर घर को सिर पर उठा लेती थी। दिन रात की चक - चक से मेरा मन बहुत उदास रहने लगा। एक दिन मैं खाने के लिए जैसे ही घर जा रहा था। मैंने सुना की राहुल नेहा से कह रहा था। कि सभी लड़ाइयां का कारण मेरा पिता है क्यों न उन्हें अनार्थ आश्रम में छोड़ आए। मेरा मन अंदर ही अंदर फबक-फबक कर रो पड़ा। शायद राधा मेरी पत्नी अभी जिंदा होती तो। हम किसी तरह दोनों पति-पत्नी अपना जीवन अलग से ही व्यतीत कर लेते। यह लड़ाई झगड़ा मेरे ही कारण होते हैं। मां बाप अपने बच्चों को कितनी मुसीबत से पाल- पोसकर बड़ा करते हैं। जो कुछ कमाते अपने बच्चों के लिए कमाते हैं। लेकिन बच्चों को केवल मां-बाप का साथ बुढ़ापे में ही देना होता है। अगर अनार्थ आश्रम में बुढ़ापा गुजरना होता तो। मां-बाप अपने बच्चों जन्म देकर पाल-पोसकर बड़ा क्यों करते, क्यों इतने कष्ट उठाते। तभी से में बिना कुछ कहे अनार्थ आश्रम मे आ गया। 12 महीने गुजर चुके हैं। अभी तक राहुल ने मेरी खोज-खबर भी नहीं ली। शायद मेरे आने से लड़ाई- झगड़े तो बंद हुए। खयालों में खोया हुआ था।कि तभी पीछे से आवाज आई रामदीन- रामदीन पीछे मुड़कर देखा तो संजय शुक्ला जो मेरा परम मित्र था। अनार्थ आश्रम में दोनों साथ-साथ रहते हैं। एक दूसरे से सुख दुख की बात करते रहते हैं। संजय शुक्ला बोला- मैं कब से अंदर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। चलो चलकर शाम का खाना खा लेते हैं। मैं भी बोल पड़ा चलो चलते हैं।Aaa


समाप्त


              लेखक - रमेश बाबू


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