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शनिवार, 16 सितंबर 2023

विध्वंसकारी या स्वयं हितकारी भाषा ज्ञान -

हर मनुष्य भाषा का प्रयोग करते हैं ।जिससे कि दूसरा व्यक्ति उसी ही भाषा के रूप में जवाब दे सके। किंतु मनुष्य को समय ,जगह ,व्यक्ति( स्त्री, पुरुष) की मंशा या परिस्थिति के अनुकूल ही भाषा का प्रयोग करना चाहिए। जिसका अंदाज हम उसके हाब- भाब,  बोल-चाल या उसके चेहरे से पता लगाया जा सकता है। जिससे कि उसकी मानसिकता को आगत या बुरा सुनने को या प्रतिकूल परिणाम न निकले। यदि कोई व्यक्ति मानसिक या शारीरिक या किसी चीज के लिए दुखी अफसोस कर रहा हो। उसी समय अगर अगर दूसरा व्यक्ति खिल्ली या मजाक जनक कष्टदायक भाषा का प्रयोग करता है । है तो उसके मन मस्तिष्क में आगत लगता है ।इसका मतलब है कि- किसी विस्फोटक चीज को रखकर तिल्ली(आग) जलने का काम स्वयं का रहता है। मतलब जानबूझकर आपत्ति मोल लेना है। या स्वयं या दूसरे व्यक्ति से लड़ाई- झगड़ा निश्चित है।
जबकि इसके विपरीत किसी किसी निराश, दुखी व्यक्ति के को मृदु भाषा द्वारा उत्साहित सात्वनां या मदद की जाए तो। उसकी मन बहुत प्रकुल्लित, या डूबते को तिनके का साहरे की जरूरत की तरह काम करता है। किंतु अगर कोई भी व्यक्ति को हम किस भाषा या ज्ञान के द्वारा उसको समझने का प्रयत्न करते हैं। अगर वह क्रोधित या अहंकार का रूप धारण करता है।तो या कोई बात मानने को तैयार नहीं है। तो उसको समझाना बेकार है। जिससे कि स्वयं का समय तथा ज्ञान बहिष्कारी माना जाऐगा।

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