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Life Thinking

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गुरुवार, 23 नवंबर 2023

आदी या बर्बादी

आदी - का शब्दार्थ यानी आदत से संबंधित होता है।
एवं मनुष्य अपने जीवन में अपनाते हैं। जो स्थाई रूप से अपने कार्य के रूप में प्रयोग करता है। जो कार्य का भाग ने होकर एक तरह की आदत होती है। एवं शारीरिक मानसिक, आर्थिक, एवं सामाजिक परिस्थितियों का उल्लंघन करती है। जिसे सुनने मात्र से ही दूसरे व्यक्ति को ग्लानि सी महसूस करता है। यह एक तरह की मानसिक स्थिति को घर बना लेती। जिससे उससे निकालना या छोड़ना ना के बराबर होता है। लेकिन नामुमकिन भी नहीं होता। शुरू में तो व्यक्ति दूसरे को देखकर अपने शौक के लिए प्रयोग में लाता है। किंतु धीरे-धीरे उसे चीज का या किसी भी अनुप्रयोग कार्य करने का आदी हो जाता है। जिसको न करने पर या उपयोग में नहीं लाने पर। स्वयं को असंतोषजनक महसूस करता है। लेकिन धीरे-धीरे वह अपने मन मे गिन्न सी महसूस भी करता है। शायद इस कार्य या आदत को अपने जीवन में ने अपनाता या करता।
 
       लेखक - रमेशबाबू

मंगलवार, 21 नवंबर 2023

जीवन की कश्ती मनुष्य पर क्यों हसंती?

जिस तरह व्यक्ति अपने किसी कार्य को सुलभ और आसन बनाने के लिए। उसे नया रूप, रंग, आकर और अपने कार्य के अनुसार उपयोग में लेता है। किंतु कुछ मनुष्य उसमें कुछ खामियां या त्रुटियां का अनुभव नहीं लगा पता है। तथा उसको अपने कार्य के लिए उपयोग में ले लेता है। लेकिन कार्य के दौरान उसे उन कमियों का अनुभव या अंदाज लगता है। जिसे बह तुरंत या जल्दी में उसे कार्य, खामियों की पूर्ति नहीं कर पाता। मन मे यह विचार करता कि शायद में समय रहते इनको ठीक कर पाता । या पहले  ही इन कमियों को देख पाता। लेकिन अब देर बहुत हो चुकी थी।
शायद।
उसी तरह व्यक्ति अपने जीवन में या अपने जीवन में होने वाले कार्य की गलती को समय रहते अगर ठीक नहीं कर पाता है। वर्तमान काल से बुरा भविष्य काल होता है।
इसलिए वर्तमान को भविष्य काल समझकर कार्य को गति देना चाहिए।
 
लेखक -  रमेशबाबू



सोमवार, 20 नवंबर 2023

सृष्टि कर्ता परमात्मा है! तो दृष्टि कर्ता कौन? - आध्यात्मिक ज्ञान

जीवो की उत्पत्ति एवं मृत्यु की काल अवधि के अनुसार उनका चक्र निर्धारित किया गया। किंतु उनके कर्म तथा कार्य को गति प्रदान करने के लिए। विवेक या बुद्धि प्रदान की गई है। जिससे जीव अपने-अपने स्थान पर शरी,र क्षमता, बे बुद्धि के अनुसार कार्य को बढ़ावा देते रहते हैं। या करते रहते हैं। समय चक्र पूर्ण होने पर वह शरीर छोड़ प्रकाश रूपी आत्मा के साथ वापस ब्रह्मलोक लौट जाती है। जिसका पूर्ण निर्माण कर किसी भी रूप शरीर में वापस आत्मा डाल दी जाती है। हम सब यह जानते कि सृष्टि का निर्माण करता ब्रह्मा जी को माना जाता है। या प्राणी जगत निर्माण कर्ता परमात्मा है।

- दृष्टि कर्ता कौन - प्रकृति द्वारा दिए गए शरीर या जीव का निर्माण बिना किसी कारण से नहीं होता।  इस प्रकार  बिना किसी कारण से किसी जीव की मृत्यु हुई नहीं होती है। किंतु जीवन काल पूर्ण किए बिना मृत्यु होना । कुछ हद तक मनुष्य स्वयं भी जिम्मेदार होता है।  बह अपने शरीर की इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं होना तथा मनुज तन को गलत उपयोग में लगाना। कहते हैं? कि तन हमारा मंदिर है  तो मन( आत्मा) हमारा भगवान है। जिसकी देख - रेख जिस तरह मनुष्य करना चाहता है।  कर सकता है या बन सकता है। यानी दृष्टि कर्ता मनुष्य स्वयं होता है।

लेखक - रमेशबाबू

मंगलवार, 14 नवंबर 2023

कविता - जिंदगी

                           

                            जीने का सहारा दिखाती है ।जिंदगी

                             दिलों में प्रेम रस बरसाती  है।.....

                             जीने का ढंग से सिखाते है।.....

                             चलने का रास्ता दिखाती है।..... 

   आगामी कल को दिखाती है। जिंदगी  

   सुख -  दुख में साथ निभाती है। .....                 

   घर - आंगन को महकाती है.....

   जीवन में कुछ कर दिखाती है।.....


                            दोस्त नये दुश्मन बनाती है। जिंदगी 

                           अपने को अपनों से लड़ाती हे।.......

                           जीवन में घुल मिल जाती है।........

                          सुख खुश दुख मेआंसू दिखाती है।...


   Ramesh Babu

रविवार, 12 नवंबर 2023

रिश्तो की उलझन - पारिवारिक

सामाजिक, आर्थिक एवं पारिवारिक स्थितियों का तालमेल एवं पति - पत्नी का एक दूसरे का विश्वास बनाए रखकर ही जीवन को सरलता पूर्वक यापन किया जा सकता है। अगर इनमें से किसी भी स्थिति में तराजू के पलडे़ की तरह कम या ज्यादा होने पर अविश्वास का बह बीज उगना शुरू हो जाता है। जो समय रहते अगर नष्ट नहीं किया गया तो बड़ा होने पर कई तरह की विकट परिस्थितियों को आमंत्रित कर देता है। जिसे संभालना बहुत कठिन हो जाता है। जिससे स्वयं बे परिवार को उसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है। जिसमें से एक को चुनना पड़ता है। जिससे दोनों को रास्ते अलग हो जाते हैं। या तराजू के पलडे़ को समान रूप में करने के लिए एक ऊपर एक नीचे का अन्तंर आता ही रहता है। जिसकी पूर्ति या समान करने में जीवन भर लग जाता है। रिश्तो की पकड़ या रिश्तो को समान स्तर से चलाने के लिए समय-समय पर जांच एवं त्रुटि, भ्रांतियां को समझाइए कर समाप्त करना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि हर व्यक्ति की इच्छा समान रूप से नहीं होती है। जिसे हम समय रहते या समय पर पूर्ति नहीं कर सकते हैं।

    लेखक - रमेशबाबू

शनिवार, 11 नवंबर 2023

जीवन के कुछ रिश्तो में अंतर -

जीवन के कुछ ऐसे रिश्ते होते जो एक तरफ झुकाव या एक तरफ ध्यान देने से ! मनुष्य के मनोबल को तोड़ता है?
जैसे -  मां-पिता का एक बच्चे की तरफ ध्यान देना !
या दूसरे बच्चों को स्नेह , प्रेम व्यवहार से वंचित करना !
या बच्चे, बच्चियों में अंतर के आधार पर व्यवहार करना । क्योंकि उनका भी अपना अलग ही अस्तित्व है। जिनके बिना हमारा जीवन भी नाम मात्र का है



शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

कहानी- राज़ एक दास्तां

अपने दोस्त के यहां कुछ निमंत्रण क्या था ? जो की डाक पत्र द्वारा मिला था। मेरा सहपाटी पास वाले गांंव में रहता था। साथ ही नेक दिल का था।
लेकिन मुझे पता था कि उसकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब है! साथ  ही गरीब होने के कारण उनकी या उसकी शादी नहीं हो पा रही थी । मां पिता बचपन से ही गुजर गए थे ।क्यों नहीं उनका पता लगाए जाएगी?
की आर्थिक हालात के अलावा इनकी मनोबल विशेषताएं देखी जाए।
हालांकि मेरे दोस्तों ने उनके बारे में बहुत कुछ अलग सोचा था । क्यों नहीं इस बात का अलग से ही सोचा जाए। क्या पता लगाया जाए ।
यही विचार करके अपने आप को समझाते हुए अपने दोस्त के यहां पहुंच चुका था।
एक तरफ उनकी माली हालत देखकर ।
कुछ अलग से ही विचार मेरे मन में या मैं सोच रहा था।
लेकिन मेरे को उससे कुछ अलग ही सोचकर विचार देखने को मिले।
शहर से गांव तक का लंबा सफर होने के कारण मैं थोड़ा थकान महसूस कर रहा था।
गांव पहुंचने पर अपने दोस्त के घर पर बिजी चारपाई पर मैं बैठ गया था।
कुछ बच्चे मैदान में खेल रहे थे 
क्यों न  कुछ श्याम के बारे में पूछा जाए
मेरे पहुंचने पर बच्चे ने जवाब दिया कि 
श्याम काक
अभी बाजार गए हैं 
मैंने पूछा क्या लेने गए।।
बच्चे ने उत्तर दिया कि।
उनके परम मित्र आने वाले हैं।
जो कि।
उनके लिये।
कुछ लाने वाले हैं।
मैंने सोचा कि मेरे पास सब कुछ है क्या लाएये। वह

हो सकता है।
बह
कुछ मिठाईयां या फल फ्रूट लेने गया होगा।
मैं कुछ समय इंतजार कर कर।
वापिस।
थकान होने के कारण।
शाम की खटिया पर लेट गया क्योंकि।
यही सोच रहा था कि।
हालांकि मैं खुद आत्म स्वाभिमान।
होने के कारण किसी दूसरे के पास नहीं जाता था।
लेकिन मेरी आत्मा ने अलग विचार करने के कारण कुछ अलग ही सोच दी थी।
अगले पल मुझे कुछ अलग ही देखने को मिला था कि ।
मेरे माता-पिता को साथ में लिए हुए।
घर पर पहुंच चुका था।
भूली बिसरी बातें मेरे दिमाग से हट चुकी थी।
यह बात मेरे दिमाग में फिर आना शुरू हो गई थी।
मेरा नाम अजीत राय था।
मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान था।
बहुत मन्नते और देवी देवताओं की मन्नतें मांगने पर एक बारिश पैदा हुआ था।
जिससे घर वालों को खुशी और साहरे की आस पैदा होती हुई थी।
पर लिखने- पढ़ने पर मेरे मां बाप ने गांव  से शहर की तरह लिखने पढ़ने भेज दिया था हालांकि । मेरे मां बाप की  आर्थिक हालत बहुत खराब थी लेकिन। उन्होंने जमीन जाय-धात कम होने के कारण भी मेरी पढ़ाई पर विशेष ध्यान।दिया
साथ ही स्वयं दूसरे की मेहनत मजदूरी कर कर मेरी पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया और मेरा मनोबल भी कम नहीं था। मैं सभी पढ़ाई हूं मैं विशेष ध्यान देते हुए बीए( आर्ट्स कॉमर्स ) फाइनल पास कर लिया । और मेरा नंबर सेकंड ग्रेड टीचर में सिलेक्शन हो गया।
जिससे  मेरे मां - पिता को खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
और मेरी ड्यूटी कहीं बाहर लग गई हालांकि मैं अपने माता-पिता को टाइम टू टाइम पोस्ट के द्वारा अपनी खबर भेज ता राहा।
लेकिन वो कहते हैं कि प्यार किसी को बताकर नहीं आता ।
मैं जो अपने मकान के पास में रहने वाली ।
सरदा जो कि कुछ b.a. फाइनल कर रही ।
मेरे से हर रोज एग्जाम या उससे संबंधित प्रश्नों के बारे में मेरे से पुचती रहते थे कि।
कौन से प्रश्न आएंगे या किस बारे में आएये।धीरे- धीरे
सरदा से मेरा प्यार बढ़ता गया।
और हम दोनों ने लव मैरिज कर ली।
बिना किसी अपने मां- पिता को बताऐ। बिना अलग से ही दुनिया बसा ली।
नही मां-पिता की खबर लेता था। और बहुत दिनों से अपने गांव भी नहीं गया था।
मां- पिता अपना जैसे तैसे गुजारा चला रहे ।थे
एक रोज अजीत राय के पिता श्याम से मिलने आए तो श्याम ने पूरी बात उनके पिताजी को बताई।
 श्याम ने कहा काका आज अजीत राय यानि मेरे परम मित्र आने वाले आप दोनों मेरे साथ चलिये।
मां-पिता की हालत और उनको सामने देखकर मेरी आंखें भर आई । मां- बाप बच्चों के लिए इसलिए पढ़ाते-लिखाते और खुद सब कुछ सहन करते रहते हैं। अपने बच्चों के लिये ताकि उनका ख्याल रख सके। और बुढ़ापे का सहारा बने। मैं कितना खुदगर्ज निकला।
आंखों से मेरे असुधारा बह निकली। माता- पिता को अपने साथ चलने को कहा। और श्याम को भी धन्यवाद दिया।
शायद श्याम के पास नहीं आता तो। मैं अपने आप को कभी नहीं माफ कर पाता।
    
                   धन्यवाद.......


      लेखक   -  रमेश बाबू









A person cheating -

गुरुवार, 9 नवंबर 2023

बच्चों की सोच मां-पिता पर निर्भर करती है। या बच्चों का भविष्य का निर्माण कर्ता माता- पिता ही हैं।


जहां मनुष्य अपने जीवन को संवारने में तथा अपने परिवार की आर्थिक, सामाजिक स्थिति तथा परिवार को खुश रखनेे का निरंतर प्रयास करता ही रहता हैै। यह सब कुछ करतेेे रहने में यह भी पता नहीं पड़ता है । कि बच्चोंं की बच्चोंं पढ़ाई लिखाई, शादी, विवाह बच्चों के बच्चे जीवन निरंंन्तर ही निकलता चला जाता है । लेकिन कुछ इसमें सीखनेेेेेेेे लायक बात यह है । अपने बच्चों की भविष्य की हर एक व्यक्ति चिंता करता है। या करनेेे लायक भी है ।
लेकिन इससे मात-पिता को सीखने लायक बात यह है। कि - हर एक पिता या मां-बाप अपने बच्चों के भविष्य के लिए करता है। लेकिन 
बच्चों को सुधारने के लिये -  सुधारने के लिए माता-पिता स्वयं जिम्मेदार क्योंकि अपनों से बड़े या पूर्वज कहते है कि=
पूत( पुत्र या पुत्रियां) के गुण  पालना( एक तरह का झूलने वाला झूला) में ही दिख जाते हैं।
लेकिन इसके साथ भी बच्चों में आत्मनिर्भरता तथा स्वयं की जिम्मेदारी को समय तथा समय के विस्तार को भी समझना होगा।
क्योंकि अभी बह स्वयं बच्चे हैं।  लेकिन यह जिम्मेदारी भी या पिता या माता की जिम्मेदारी भी आगे जाकर खुद को भी निभाना है। या स्वयं को निभाना।
यह गुण बचपन से ही आरोपित या समझना होगा।
जिस की काबिलियत हो गुना का निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी
चलता ही रहे ताकि = बेटा बाप बनने से पहले अपनी पीढ़ी में शुद्धिकरण और सुधार ला सके।
क्योंकि बह स्वयं भी में पहले किसी का बेटा था अभी किसी का पिता है । अगर यह क्रिया हर व्यक्ति या पिता अपनाते हैं । तो समस्या परे से बाहर ही रहेगी । अपितु गुणों का विकास  भी संसारी जीवन पर आधारित करता या जीवन के आधार पर निर्भर करता है। 
जिसका आधार बताने योग्य नहीं- वह स्वयं पर या कल्चर आधारित रहता है । जिसको हम से स्वयं या सामाजिक की स्थिति देख रहे हैं।


                                               लेखक - रमेश बाबू

मंगलवार, 7 नवंबर 2023

लक्ष्य - सफलता से दूर क्यों ?

मनुष्य हर एक सफलता पाने की इच्छा रखता है। जो कि रखना भी जरूरी है। लेकिन जितनी बड़ी इच्छा रहती है। उतना ही बड़ा जोखिम या परेशानियों का सामना करना पड़ता है। एवं शारीरिक, मानसिक बे आर्थिक परिस्थितियों को अनुकूल बनाकर चलना पड़ता है । किंतु मनुष्य जोखिम या रिक्स भी नहीं लेना चाहता है।तथा उसे कार्य को सफलता की दृष्टि से देखता रहता है। जो संभव नहीं है। जिस तरह पका हुआ आम खाने की इच्छा रखते हैं। तो पहले पौधे को अनुकूलित वातावरण चारों तरफ पौधे के लिए सुरक्षा कवच अपनी देखरेख एवं बड़ा होने पर फल एवं पकने का इंतजार करना बहुत जरूरी है। उसी तरह जिस कार्य को हम करते हैं। या करने वाले होते हैं। उसका तुरंत परिणाम या मिलने की इच्छा से नहीं करना चाहिए। साथ यह निर्धारित करता है। कि तुमने जिस कार्य को या जिस लक्ष्य को चुना है। उसे कार्य में जो खामियां या कमियां होती है। उसी की पूर्ति के ही लिये व्यक्ति को प्रॉफिट या लाभ मिलता है। जो स्वयं पर निर्धारित करता है। कि हम इस कार्य या खामियों की पूर्ति करने योग्य है। या नहीं है।


 
        लेखक - रमेशबाबू

कहानी - मतलबी दुनिया

स्वयं पर विश्वास क्यों?

स्वयं पर इतना विश्वास रखो कि तुम जिस कार्य को करने का निश्चय करते हो, उसे पूर्ण करके ही छोड़ो। क्योंकि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति ...

कहानी = मतलबी दुनिया नारी विशेष