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गुरुवार, 9 नवंबर 2023

बच्चों की सोच मां-पिता पर निर्भर करती है। या बच्चों का भविष्य का निर्माण कर्ता माता- पिता ही हैं।


जहां मनुष्य अपने जीवन को संवारने में तथा अपने परिवार की आर्थिक, सामाजिक स्थिति तथा परिवार को खुश रखनेे का निरंतर प्रयास करता ही रहता हैै। यह सब कुछ करतेेे रहने में यह भी पता नहीं पड़ता है । कि बच्चोंं की बच्चोंं पढ़ाई लिखाई, शादी, विवाह बच्चों के बच्चे जीवन निरंंन्तर ही निकलता चला जाता है । लेकिन कुछ इसमें सीखनेेेेेेेे लायक बात यह है । अपने बच्चों की भविष्य की हर एक व्यक्ति चिंता करता है। या करनेेे लायक भी है ।
लेकिन इससे मात-पिता को सीखने लायक बात यह है। कि - हर एक पिता या मां-बाप अपने बच्चों के भविष्य के लिए करता है। लेकिन 
बच्चों को सुधारने के लिये -  सुधारने के लिए माता-पिता स्वयं जिम्मेदार क्योंकि अपनों से बड़े या पूर्वज कहते है कि=
पूत( पुत्र या पुत्रियां) के गुण  पालना( एक तरह का झूलने वाला झूला) में ही दिख जाते हैं।
लेकिन इसके साथ भी बच्चों में आत्मनिर्भरता तथा स्वयं की जिम्मेदारी को समय तथा समय के विस्तार को भी समझना होगा।
क्योंकि अभी बह स्वयं बच्चे हैं।  लेकिन यह जिम्मेदारी भी या पिता या माता की जिम्मेदारी भी आगे जाकर खुद को भी निभाना है। या स्वयं को निभाना।
यह गुण बचपन से ही आरोपित या समझना होगा।
जिस की काबिलियत हो गुना का निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी
चलता ही रहे ताकि = बेटा बाप बनने से पहले अपनी पीढ़ी में शुद्धिकरण और सुधार ला सके।
क्योंकि बह स्वयं भी में पहले किसी का बेटा था अभी किसी का पिता है । अगर यह क्रिया हर व्यक्ति या पिता अपनाते हैं । तो समस्या परे से बाहर ही रहेगी । अपितु गुणों का विकास  भी संसारी जीवन पर आधारित करता या जीवन के आधार पर निर्भर करता है। 
जिसका आधार बताने योग्य नहीं- वह स्वयं पर या कल्चर आधारित रहता है । जिसको हम से स्वयं या सामाजिक की स्थिति देख रहे हैं।


                                               लेखक - रमेश बाबू

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