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Life Thinking

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गुरुवार, 31 अगस्त 2023

Maa The Great (life biography) -

 प्रकृति का संतुलन बनाने के लिए परमात्मा द्वारा जन्म मृत्यु का अंतराल रखा गया है। या जीव - जंतु में पेड़ - पौधे समय सीमा सुनिश्चित की गई। मनुष्य जीव उत्पत्ति में तीनों अहम भूमिका होती है
1.विधाता   - परमपिता परमात्मा
2. जन्मदात्री- जन्म देने वाली मां
3. जन्मदाता- पालन पोषण करने वाला पिता
परमपिता परमात्मा का अलावा दूसरे स्थान जो आता है वह मां का होता है।
मनुष्य हो या जीव - जंतु लेकिन जो मां होती है। अपने बच्चों के लिए सब कुछ समर्पित करने का भाव या बच्चों की रक्षा हेतु दूसरे मनुष्य या जीव जंतुओं से लड़ने साहस भी रखती है।
जीव उत्पत्ति के बाद में बालक में मां का शब्द का विवरण - जीवात्मा डालने से ही पहले परमात्मा( ब्रह्मदेव) जन्म - मृत्यु, कुल ,कार्य , बिकार आदि विशेषताएं। कब कैसे और क्यों उसकी मृत्यु होगी का लेखा-जोखा जीवात्मा के सामने किया जाता है।
जीवात्मा परमात्मा से सवाल करती है। कि यह परमात्मा जो यह मेरा वजन अपने पेट में रखकर या उसके पेट में लात मार रहा हूं बह  फिर भी अपना कार्य सही रूप से करने वाली कौन है? प्रत्यक्ष रूप से बताइए
परमात्मा - कहते हैं कि यही तेरी मां है जो तेरे को 9 महीने अपने पेट में रखकर रक्त से सिंचित करती रहती है! और तेरे सांसारिक जन्म लेने पर तेरे रोने पर निशतन पान करावेगी । जो तेरे बड़े होने के लिए उपयोगी है। तेरे रोग ग्रस्त होने पर वह सब कुछ न्यौछावर कर देगी।
तेरे पिता - तुझे अपने सीने से लगाकर लाड - प्यार करेगा।
जीवात्मा परमात्मा से फिर सवाल करती है। कि यह पिता क्या होता है।
परमात्मा - तेरे पिता तेरा लालन पोषण प्यार और आर्थिक जरूरत को पूरा करेगा।
है जीवात्मा सांसारिक या मृत्यु लोक में जाने के बाद इंद्रियों के अधीन होकर अपनी मां - पिता को दुखी और निराश मत करना। यही तेरा पहला कर्तव्य है। क्योंकि वे तेरे जन्म से लेकर उनकी मृत्यु तक तेरे लिये शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयों से गुजरते हैं।
और
  गुरु तेरे को सद्मामार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा।
जिससे तेरे को जन्म- मरण योनियों से मुक्ति मिल जाएगी।
लेकिन है। यह सब ज्ञान, युक्तियां सतलोक तक ही सीमित है। तेरा मृत्यु लोक में जन्म होने पर यह सब ज्ञान रहस्य वातावरण के अनुसार तू सब कुछ भूल जाऐगा

जीवात्मा- है सृष्टि के स्वामी है मुझे एक कोई ऐसा वरदान दो। कम से कम दो शब्दों का तो ज्ञान दो। जिससे कि मैं बालक रूप मे भूख या कोई शारीरिक कष्ट होने पर किस पुकारू या किसे कहूं यह कैसे कहूं कुछ शब्दों का ज्ञान दो।
परमात्मा - है जीवात्मा तेरे कहना का तात्पर्य भी सही है। तेरे मुंह से जो पहला शब्द निकलेगा। बह मां कहलायेगा।
लेकिन जो आत्माएं यह वरदान नहीं मांगती है। बह जीवन भर  गूंगी ,बेरी रहेगी।

                                      लेखक - रमेशबाबू

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

झिझकता पूर्ण जीवन ( जीवनी) - लेख

भौतिक संसाधनों को या जीवन में काम आने वाली वास्तुओं को हर समय हर जगह सभी चीजों को नहीं रख सकता। या साथ में रखकर नहीं चल सकता। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये। एक दूसरे पर निर्भर रहना ही पड़ता है। जो की एक सत्यता पूर्ण बात है।

लेकिन इस संसार में बहुते ऐसे व्यक्ति है ।जो दूसरे व्यक्ति से चीज वस्तु या आर्थिक मदद मांगने से अपने आप में शर्मिंदगी या झिझकते हे। 

जैसे- श्याम कोई चीज या वस्तु देगा या नहीं देगा शायद उसके पास होगी या नहीं होगी। या वह मना करने पर और व्यक्तियों के सामने मेरे को शर्मिंदा होना पड़ेगा। यही विचार करने पर वे दूसरे व्यक्ति के पास जाने से कतराता रहेगा। या अपनी बात नहीं रख पाता।

लेकिन बह यह नहीं समझता है। कि - श्याम के मना करने पर श्याम के पास खड़े व्यक्ति भी किसी भी वस्तु या चीज को मांगने से पहले स्पष्ट रूप से उनके सामने बात को रखना चाहिए ताकि वे स्वयं भी उसे बात को सक्रिय भाव से ले और मदद कर सके।

जिससे भौतिक संसाधन या आर्थिक की कमी के कारण कार्य में दिन - प्रतिदिन उसके कार्य में बाधाये आती ही रहयेगी। ने की बाधाओ की कमी होगी।

                                              लेखक - रमेशबाबू


 


मतभेद या रिश्तो का पतन (जीवनी) - लेख

जीवन में रिश्तों की बुनियाद एक कच्चे धागे की तरह होती है। चाहे वह रिश्ता किसी तरह का हो। लेकिन ज्यादातर रिश्ते सख रुपी बुनियाद वे आपसी मतभेदों के कारण ज्यादातर टिक नहीं पाते हैं। जिससे पुराने से पुराना रिश्तो में आपसी दरार आ जाती है। या यूं कहे की कच्चे धागे को दोनों तरफ से खींचने पर वह टूट ही जाता है। जिसे आसानी से जोड़ना या दरार को भरना बहुत ही मुश्किल होता है। लेकिन नामुमकिन नहीं। लेकिन उन रिश्तो की बुनियाद इतनी मजबूत नहीं रहती है। जितनी कि पहले थी। थोड़ी सी हवा या किसी दूसरे गलत व्यक्ति द्वारा झूठी अफवाह द्वारा ही दोनों के रिश्तों पतन हो जाता है। बही रिश्ता एक दूसरे के शत्रु के समाने नजर आते हे। जबकि अगर एक व्यक्ति अपवाह या अफवाह से संबंधित खोजबीन कर उसके कारण का पता लगता है। या जिस व्यक्ति ने अफवाह फैलाई उस व्यक्ति को दोनों पक्षों के सामने लाकर शक्ती से पूछा जाये। और कारणों का पता लगाया जाये। जिससे कि रिश्ता टूटने से पूर्ण रूप से बच जाऐ।

                                         लेखक - रमेशबाबू

बुधवार, 23 अगस्त 2023

शरीर की बाहरी एवं आंतरिक आत्माओं का संघर्ष - आध्यात्मिक ज्ञान (लेख)


मनुष्य के शरीर में दो तरह की आत्मा निवास करती है बाहरी एवं आंतरिक
=1.बाहरी यानी सांसारिक सुख
=2. आंतरिक यानी स्वयं एवं शारीरिक सुख
 शरीर की दो बेटियां = आंतरिक एवं बाहरी।

     =  जन्मदाताशरीर( बाप)
     1. आत्मा    - आंतरिक ( बड़ी)
     2.आत्मा     -  बाहरी( छोटी)


मनुष्य कोई भी कार्य करने से पहले अपने आप से या स्वयं से यह निर्णय लेता है कि यह कार्य(काम) होगा या नहीं होगा या यह कार्य ( काम)अच्छा है या बुरा है। यही सोच में बहे डूबा रहता है।इसी बीच बह बाहरी और आंतरिक आत्माओं से अपना निर्णय लेगा। इसी के साथ ही शरीर इन दोनों का बाप है
1.बाहरी(उपरी) 2. आंतरिक( अंदर)

1.बाहरी= बाहरी आत्मा जो हम देखते हैं ।यह स्पर्श करते। या किसी चीज का स्वाद, यानि सांसारिक सुखों वाली होती है। जो शरीर और आंतरिक आत्म का साथ ने देकर स्वयं का ही हित चाहती है।
जो सांसारिक सुखों के चक्कर मे बाप(शरीर),
बड़ी बहन आंतरिक आत्मा दुख देने में कोई कसर नहीं छोड़ती जो इंद्रियों (काम ,क्रोध, मद ,लोभ) के अधीन होकर बाप( शरीर) स्वार्थ रूपी लालच देकर बस में रखती रहती है।
जिससे वह स्वयं का विनाश करती है । साथ में अपने बाप( शरीर )लेकिन आंतरिक आत्मा अजर अमर है।

आंतरिक आत्मा जो अपने अध्यात्मिक ज्ञान से अपनी छोटी बहन( बाहरी)  अपने पिता( शरीर) को पूर्ण रूप से समझाने का प्रयास है।

2.आंतरिक आत्मा जो भोग - विलासिता  या इंद्रियों के अधीन ने होकर सत्य कर्म तथा बाप( शरीर )की तरफ ध्यान देकर बाहरी आत्मा को बार-बार समझाने की राय देती रहती है। की सांसारिक सुखों की तरफ ध्यान मत दे । यह लुभाने एवं भ्रमित स्रोत है ।जो पल भर के लिये तो सुख देते हैं। लेकिन जीवन भर के लिऐ दुखों का कारण भी यही बना जाते। इसमें मेरा कुछ नहीं जाता। शरीर(पिता) और बाहरीआत्मा तुम दोनों का ही विनाश है ।


                                               लेखक - रमेशबाबू
                                



       

मंगलवार, 22 अगस्त 2023

बच्चों का बचपन या निर्माण - लेख

सभी माता-पिता को अपने जीवन बच्चों का इंतजार रहता है। या आते हैं। जिससे उन्हें खुशी या गर्व महसूस करते हैं। जिससे उन्हें यह अपने बच्चों से भविष्य में बहुत आशा रहती है। या रखते हैं।
साथ ही अपने बच्चों का जीवन सुधारने के लिए सब कुछ करते हैं। या करते रहते हैं।
जिससे कि स्वयं से ज्यादा सामाजिक आर्थिक स्थिति में हमेशा आगे रहे।
लेकिन इन सब मैं  माता-पिता स्वयं अहम भूमिका निभाते है। कि बच्चों का भविष्य किस तरह रखना है ।या कैसा रखना है। जिस अगर किसी नये मकान का निर्माण किया जाए तो उसकी आधारशिला नींब पर ही निर्भर करती है। उसी प्रकार जो संस्कार या गुण बच्चों में बचपन से या बचपन में अंकुरित किया जाता है।
वही संस्कार धीरे-धीरे विकसित होते चले जाते हैं। जो एक भविष्य की आधारशिला बन जाता है। या दिखाई देते हैं।
जिस तरह गीली  मिट्टी से कुम्हार या बनाने वाला जो चाहे उसका रूप, आकार दे सकता है।
मिट्टी से बनी वस्तुओं को अगर पका दिया जाये।
उसमें कोई भी संशोधन नहीं किया जा सकता है।
संशोधन या परिवर्तन करने पर मिट्टी से बनी वस्तुएं टूट जाती है। उसी प्रकार बच्चों के जवान या बड़े होने पर संस्कार या गुणों का संशोधन नहीं किया जा सकता है। या करने पर रूस्ट हो जाते या दुखी हो जाते हैं।

                                     लेखक - रमेश बाबू

रविवार, 20 अगस्त 2023

मनुष्य से मनुष्य पर मानसिक चोट -(लेख)


हम सभी जानते हैं । कि जितना सुलभ मनुष्य जीवन मानते हे। उतना हे। नहीं सभी एक समान जीवन व्यतीत नहीं करते। कितने ही मनुष्य को समय से ही दुखों  या कठिनाइयां सहन करने की आदत सी हो जाती है।
लेकिन जो पहली बार अपने जीवन में देखता है। तो
बह भयभीत सा हो जाता है। और आने वाली कठिनाइयों को पूर्ण रूप से सामना नहीं कर पाता है।
जिससे बे आर्थिक या सामाजिक नुकसान को सहन नहीं कर पाता है। और अपने मन मस्तिष्क में छवि या कार्य को बार-बार महसूस करता रहता है।
जिस तरह किसी मोबाइल में पासवर्ड डालकर भूल गए हो। और उठते बैठते खाते-पीते नींद भी अच्छी तरह नहीं आती जिससे हरदम - हरपल बेचैनी महसूस होती रहती है। या करता रहता है। अपने जीवन को या जीवन जीने का लक्ष्य सुन्य मान हो जाता है। या मानने लगता है। तथा अपने द्वारा किए गए कार्य में रूचि नहीं लेने से गलती पर गलती करता रहता है।
जिसे मनुष्य कुछ अलग ही रूप दे देता है। या पागल समझने लगता है।
लेकिन ऐसा करने पर मनुष्य या मनुष्य के द्वारा किए गये कार्य या समय को वापस नहीं लाया जा सकता है।
यह उसकी स्वयं की भूल यह हे। अपने या अपने द्वारा किए गए कार्य या समय को वापिस मुड़कर नहीं देखना चाहिए क्योंकि समय जो चला गया है ।वह वापस नहीं आएगा या अपने द्वारा या किसी के द्वारा पहुंचा गई चोट किए गए कार्य को वापस नहीं लाया जा सकता है। तथा हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए भूतकाल का पछतावा कभी नहीं करना चाहिए।
गीता जी में श्री कृष्ण भगवान ने कहा कि-- वे स्वयं ही भूतकाल, वर्तमान काल तथा भविष्य काल का प्रतिनिधित्व. करते हैं।


नशा या स्वंय का विनाश (लेख)


मनुष्य ने या जिस जीव ने धरती पर जन्म लिया हर चीजों या हर व्यक्ति से उसके व्यवहार या परिणाम से भली-भांति परिचित है।
किंतु देखकर भी अनजान बना रहता है।
जैसे कि किसी हिंसक जीव जंतु के पास जाएंगे तो या तो बह काटेगा या खायेगा। फिर भी देख सोच कर भी अनजान की तरह मौत के मुंह में जाने से वंचित नहीं रहते। कहते है कि- जानबूझकर आफत मोल लेना।
किसी भी तरह का नशा करने वाला व्यक्ति सब कुछ( घर परिवार, मात-पिता स्त्री, बेटा- बेटी) त्याग सकता किंतु अपनी गलत आदतों या नशे का त्याग कभी नहीं करेगा।चाहे उसके परिवार को दो वक्त की रोटी नसीब न
हो।
 नशे को सब कुछ मान चुका होता है।
यह एक तरीका विकार है । जो स्वंय के साथ-साथ से परिवार सहित दुखी रहता है।
जिससे स्वयं की आर्थिक, सामाजिक ,शारीरिक जीवन को कष्ट प्रदान करता है। तथा असमय ही मृत्यु को या दर्दनाक मौत को आमंत्रित करता है।
जिसका खामियाजा(दु:ख) परिवार के सदस्यों को उठाना पड़ता है।पारिवारिक व्यक्ति अपने जीवन को कोसते रहते हैं। कि शायद में उसकी संतान या भाई नहीं होता तो यह जीवन देखने को नहीं पड़ता।
मनुष्य चाहे  जिस तरह अपने जीवन को रहन-सहने स्तर है। 
रख सकता या अच्छा जीवन व्यतीत कर सकता।
क्योंकि सब कुछ पृथ्वी पर आने पर ही व्यक्ति संगति या साथ रहने का भी पड़ता है। यह आप स्वयं पर निर्भर करता है ।  साथ ही उसमें विवेकशील , दिमाग ,मन कंट्रोल रखने की क्षमता ही मनुष्य में सर्वोपरि है । 
                             
                                      लेखक - रमेश बाबू



कहानी - मतलबी दुनिया

स्वयं पर विश्वास क्यों?

स्वयं पर इतना विश्वास रखो कि तुम जिस कार्य को करने का निश्चय करते हो, उसे पूर्ण करके ही छोड़ो। क्योंकि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति ...

कहानी = मतलबी दुनिया नारी विशेष