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रविवार, 20 अगस्त 2023

मनुष्य से मनुष्य पर मानसिक चोट -(लेख)


हम सभी जानते हैं । कि जितना सुलभ मनुष्य जीवन मानते हे। उतना हे। नहीं सभी एक समान जीवन व्यतीत नहीं करते। कितने ही मनुष्य को समय से ही दुखों  या कठिनाइयां सहन करने की आदत सी हो जाती है।
लेकिन जो पहली बार अपने जीवन में देखता है। तो
बह भयभीत सा हो जाता है। और आने वाली कठिनाइयों को पूर्ण रूप से सामना नहीं कर पाता है।
जिससे बे आर्थिक या सामाजिक नुकसान को सहन नहीं कर पाता है। और अपने मन मस्तिष्क में छवि या कार्य को बार-बार महसूस करता रहता है।
जिस तरह किसी मोबाइल में पासवर्ड डालकर भूल गए हो। और उठते बैठते खाते-पीते नींद भी अच्छी तरह नहीं आती जिससे हरदम - हरपल बेचैनी महसूस होती रहती है। या करता रहता है। अपने जीवन को या जीवन जीने का लक्ष्य सुन्य मान हो जाता है। या मानने लगता है। तथा अपने द्वारा किए गए कार्य में रूचि नहीं लेने से गलती पर गलती करता रहता है।
जिसे मनुष्य कुछ अलग ही रूप दे देता है। या पागल समझने लगता है।
लेकिन ऐसा करने पर मनुष्य या मनुष्य के द्वारा किए गये कार्य या समय को वापस नहीं लाया जा सकता है।
यह उसकी स्वयं की भूल यह हे। अपने या अपने द्वारा किए गए कार्य या समय को वापिस मुड़कर नहीं देखना चाहिए क्योंकि समय जो चला गया है ।वह वापस नहीं आएगा या अपने द्वारा या किसी के द्वारा पहुंचा गई चोट किए गए कार्य को वापस नहीं लाया जा सकता है। तथा हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए भूतकाल का पछतावा कभी नहीं करना चाहिए।
गीता जी में श्री कृष्ण भगवान ने कहा कि-- वे स्वयं ही भूतकाल, वर्तमान काल तथा भविष्य काल का प्रतिनिधित्व. करते हैं।


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