=1.बाहरी यानी सांसारिक सुख
=2. आंतरिक यानी स्वयं एवं शारीरिक सुख
शरीर की दो बेटियां = आंतरिक एवं बाहरी।
= जन्मदाता- शरीर( बाप)
1. आत्मा - आंतरिक ( बड़ी)
2.आत्मा - बाहरी( छोटी)
मनुष्य कोई भी कार्य करने से पहले अपने आप से या स्वयं से यह निर्णय लेता है कि यह कार्य(काम) होगा या नहीं होगा या यह कार्य ( काम)अच्छा है या बुरा है। यही सोच में बहे डूबा रहता है।इसी बीच बह बाहरी और आंतरिक आत्माओं से अपना निर्णय लेगा। इसी के साथ ही शरीर इन दोनों का बाप है
1.बाहरी(उपरी) 2. आंतरिक( अंदर)
1.बाहरी= बाहरी आत्मा जो हम देखते हैं ।यह स्पर्श करते। या किसी चीज का स्वाद, यानि सांसारिक सुखों वाली होती है। जो शरीर और आंतरिक आत्म का साथ ने देकर स्वयं का ही हित चाहती है।
जो सांसारिक सुखों के चक्कर मे बाप(शरीर),
बड़ी बहन आंतरिक आत्मा दुख देने में कोई कसर नहीं छोड़ती जो इंद्रियों (काम ,क्रोध, मद ,लोभ) के अधीन होकर बाप( शरीर) स्वार्थ रूपी लालच देकर बस में रखती रहती है।
जिससे वह स्वयं का विनाश करती है । साथ में अपने बाप( शरीर )लेकिन आंतरिक आत्मा अजर अमर है।
आंतरिक आत्मा जो अपने अध्यात्मिक ज्ञान से अपनी छोटी बहन( बाहरी) अपने पिता( शरीर) को पूर्ण रूप से समझाने का प्रयास है।
2.आंतरिक आत्मा जो भोग - विलासिता या इंद्रियों के अधीन ने होकर सत्य कर्म तथा बाप( शरीर )की तरफ ध्यान देकर बाहरी आत्मा को बार-बार समझाने की राय देती रहती है। की सांसारिक सुखों की तरफ ध्यान मत दे । यह लुभाने एवं भ्रमित स्रोत है ।जो पल भर के लिये तो सुख देते हैं। लेकिन जीवन भर के लिऐ दुखों का कारण भी यही बना जाते। इसमें मेरा कुछ नहीं जाता। शरीर(पिता) और बाहरीआत्मा तुम दोनों का ही विनाश है ।
लेखक - रमेशबाबू
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