https://rameshbaba7568.blogspot.com/sitemap.xml google-site-verification=kmYBgHhvuQYehft3SXRCNzxbwQDUmaBHZ5DthL_AOrA https://rameshbabu7568.blogspot.com/2024/01/blog-post.html google.com, pub-8003236985543245, DIRECT, f08c47fec0942fa0 life thinking: 2023

Life Thinking

rameshbabu7568.blogspot.com

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग क्यों कब कैसे?

जीवन मैं उद्देश्यों की प्राप्ति में सफलता अर्जित करने वाले शब्दों को प्रभावशाली शब्द कहते हैं।
जो नकारात्मक ने होकर सकारात्मक भाव से दूसरे व्यक्ति को प्रभावित कर अपनी बात मानने के लिए बाध्य करते हैं।
 तथा समय, व्यक्ति की पहचान भाषा आदि आदि को ध्यान में रखकर एवं जो चीज या जो वस्तु समर्थ है या नहीं।
 श्याम मोहन का दोस्त है। शाम को किसी चीज या वस्तु की आवश्यकता है। किंतु कैसे और कौन से शब्दों का उपयोग करे जिस की मदद मिल सके।  क्योंकि सामान्य शब्दों के प्रयोग से व्यक्ति किसी भी चीज के लिए तुरंत रूप से हां में जवाब नहीं दे सकता। 
जैसे -
1. मेरे को इस चीज(A-z) की जरूरत है। दे दीजिए।( सामान्य शब्द)
2. मेरे को इस चीज(A-z) की जरूरत है कृपया दे दीजिए( मध्य शब्द)
3. प्रिये मेरे को इस चीज(a-z)) की जरूरत है। जो कि तुम्हारे पास है। उसकी मेरे को जरूरत है। आपको समय पर लौटा दूंगा कृपया कर कर मुझे दे दीजिए।( प्रभावशाली शब्द)

 साथ हमें इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए कि जो चीज वस्तु या अन्य बातों से किसी की मदद ले सकते हैं किंतु ध्यान रहे समय से या समय के बीच में देने से दूसरे व्यक्ति में विश्वास जगता है। एवं प्रभावशाली शब्दों की शक्ति दोगुना हो जाती है।

लेखक - रमेश बाबू





गुरुवार, 23 नवंबर 2023

आदी या बर्बादी

आदी - का शब्दार्थ यानी आदत से संबंधित होता है।
एवं मनुष्य अपने जीवन में अपनाते हैं। जो स्थाई रूप से अपने कार्य के रूप में प्रयोग करता है। जो कार्य का भाग ने होकर एक तरह की आदत होती है। एवं शारीरिक मानसिक, आर्थिक, एवं सामाजिक परिस्थितियों का उल्लंघन करती है। जिसे सुनने मात्र से ही दूसरे व्यक्ति को ग्लानि सी महसूस करता है। यह एक तरह की मानसिक स्थिति को घर बना लेती। जिससे उससे निकालना या छोड़ना ना के बराबर होता है। लेकिन नामुमकिन भी नहीं होता। शुरू में तो व्यक्ति दूसरे को देखकर अपने शौक के लिए प्रयोग में लाता है। किंतु धीरे-धीरे उसे चीज का या किसी भी अनुप्रयोग कार्य करने का आदी हो जाता है। जिसको न करने पर या उपयोग में नहीं लाने पर। स्वयं को असंतोषजनक महसूस करता है। लेकिन धीरे-धीरे वह अपने मन मे गिन्न सी महसूस भी करता है। शायद इस कार्य या आदत को अपने जीवन में ने अपनाता या करता।
 
       लेखक - रमेशबाबू

मंगलवार, 21 नवंबर 2023

जीवन की कश्ती मनुष्य पर क्यों हसंती?

जिस तरह व्यक्ति अपने किसी कार्य को सुलभ और आसन बनाने के लिए। उसे नया रूप, रंग, आकर और अपने कार्य के अनुसार उपयोग में लेता है। किंतु कुछ मनुष्य उसमें कुछ खामियां या त्रुटियां का अनुभव नहीं लगा पता है। तथा उसको अपने कार्य के लिए उपयोग में ले लेता है। लेकिन कार्य के दौरान उसे उन कमियों का अनुभव या अंदाज लगता है। जिसे बह तुरंत या जल्दी में उसे कार्य, खामियों की पूर्ति नहीं कर पाता। मन मे यह विचार करता कि शायद में समय रहते इनको ठीक कर पाता । या पहले  ही इन कमियों को देख पाता। लेकिन अब देर बहुत हो चुकी थी।
शायद।
उसी तरह व्यक्ति अपने जीवन में या अपने जीवन में होने वाले कार्य की गलती को समय रहते अगर ठीक नहीं कर पाता है। वर्तमान काल से बुरा भविष्य काल होता है।
इसलिए वर्तमान को भविष्य काल समझकर कार्य को गति देना चाहिए।
 
लेखक -  रमेशबाबू



सोमवार, 20 नवंबर 2023

सृष्टि कर्ता परमात्मा है! तो दृष्टि कर्ता कौन? - आध्यात्मिक ज्ञान

जीवो की उत्पत्ति एवं मृत्यु की काल अवधि के अनुसार उनका चक्र निर्धारित किया गया। किंतु उनके कर्म तथा कार्य को गति प्रदान करने के लिए। विवेक या बुद्धि प्रदान की गई है। जिससे जीव अपने-अपने स्थान पर शरी,र क्षमता, बे बुद्धि के अनुसार कार्य को बढ़ावा देते रहते हैं। या करते रहते हैं। समय चक्र पूर्ण होने पर वह शरीर छोड़ प्रकाश रूपी आत्मा के साथ वापस ब्रह्मलोक लौट जाती है। जिसका पूर्ण निर्माण कर किसी भी रूप शरीर में वापस आत्मा डाल दी जाती है। हम सब यह जानते कि सृष्टि का निर्माण करता ब्रह्मा जी को माना जाता है। या प्राणी जगत निर्माण कर्ता परमात्मा है।

- दृष्टि कर्ता कौन - प्रकृति द्वारा दिए गए शरीर या जीव का निर्माण बिना किसी कारण से नहीं होता।  इस प्रकार  बिना किसी कारण से किसी जीव की मृत्यु हुई नहीं होती है। किंतु जीवन काल पूर्ण किए बिना मृत्यु होना । कुछ हद तक मनुष्य स्वयं भी जिम्मेदार होता है।  बह अपने शरीर की इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं होना तथा मनुज तन को गलत उपयोग में लगाना। कहते हैं? कि तन हमारा मंदिर है  तो मन( आत्मा) हमारा भगवान है। जिसकी देख - रेख जिस तरह मनुष्य करना चाहता है।  कर सकता है या बन सकता है। यानी दृष्टि कर्ता मनुष्य स्वयं होता है।

लेखक - रमेशबाबू

मंगलवार, 14 नवंबर 2023

कविता - जिंदगी

                           

                            जीने का सहारा दिखाती है ।जिंदगी

                             दिलों में प्रेम रस बरसाती  है।.....

                             जीने का ढंग से सिखाते है।.....

                             चलने का रास्ता दिखाती है।..... 

   आगामी कल को दिखाती है। जिंदगी  

   सुख -  दुख में साथ निभाती है। .....                 

   घर - आंगन को महकाती है.....

   जीवन में कुछ कर दिखाती है।.....


                            दोस्त नये दुश्मन बनाती है। जिंदगी 

                           अपने को अपनों से लड़ाती हे।.......

                           जीवन में घुल मिल जाती है।........

                          सुख खुश दुख मेआंसू दिखाती है।...


   Ramesh Babu

रविवार, 12 नवंबर 2023

रिश्तो की उलझन - पारिवारिक

सामाजिक, आर्थिक एवं पारिवारिक स्थितियों का तालमेल एवं पति - पत्नी का एक दूसरे का विश्वास बनाए रखकर ही जीवन को सरलता पूर्वक यापन किया जा सकता है। अगर इनमें से किसी भी स्थिति में तराजू के पलडे़ की तरह कम या ज्यादा होने पर अविश्वास का बह बीज उगना शुरू हो जाता है। जो समय रहते अगर नष्ट नहीं किया गया तो बड़ा होने पर कई तरह की विकट परिस्थितियों को आमंत्रित कर देता है। जिसे संभालना बहुत कठिन हो जाता है। जिससे स्वयं बे परिवार को उसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है। जिसमें से एक को चुनना पड़ता है। जिससे दोनों को रास्ते अलग हो जाते हैं। या तराजू के पलडे़ को समान रूप में करने के लिए एक ऊपर एक नीचे का अन्तंर आता ही रहता है। जिसकी पूर्ति या समान करने में जीवन भर लग जाता है। रिश्तो की पकड़ या रिश्तो को समान स्तर से चलाने के लिए समय-समय पर जांच एवं त्रुटि, भ्रांतियां को समझाइए कर समाप्त करना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि हर व्यक्ति की इच्छा समान रूप से नहीं होती है। जिसे हम समय रहते या समय पर पूर्ति नहीं कर सकते हैं।

    लेखक - रमेशबाबू

शनिवार, 11 नवंबर 2023

जीवन के कुछ रिश्तो में अंतर -

जीवन के कुछ ऐसे रिश्ते होते जो एक तरफ झुकाव या एक तरफ ध्यान देने से ! मनुष्य के मनोबल को तोड़ता है?
जैसे -  मां-पिता का एक बच्चे की तरफ ध्यान देना !
या दूसरे बच्चों को स्नेह , प्रेम व्यवहार से वंचित करना !
या बच्चे, बच्चियों में अंतर के आधार पर व्यवहार करना । क्योंकि उनका भी अपना अलग ही अस्तित्व है। जिनके बिना हमारा जीवन भी नाम मात्र का है



शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

कहानी- राज़ एक दास्तां

अपने दोस्त के यहां कुछ निमंत्रण क्या था ? जो की डाक पत्र द्वारा मिला था। मेरा सहपाटी पास वाले गांंव में रहता था। साथ ही नेक दिल का था।
लेकिन मुझे पता था कि उसकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब है! साथ  ही गरीब होने के कारण उनकी या उसकी शादी नहीं हो पा रही थी । मां पिता बचपन से ही गुजर गए थे ।क्यों नहीं उनका पता लगाए जाएगी?
की आर्थिक हालात के अलावा इनकी मनोबल विशेषताएं देखी जाए।
हालांकि मेरे दोस्तों ने उनके बारे में बहुत कुछ अलग सोचा था । क्यों नहीं इस बात का अलग से ही सोचा जाए। क्या पता लगाया जाए ।
यही विचार करके अपने आप को समझाते हुए अपने दोस्त के यहां पहुंच चुका था।
एक तरफ उनकी माली हालत देखकर ।
कुछ अलग से ही विचार मेरे मन में या मैं सोच रहा था।
लेकिन मेरे को उससे कुछ अलग ही सोचकर विचार देखने को मिले।
शहर से गांव तक का लंबा सफर होने के कारण मैं थोड़ा थकान महसूस कर रहा था।
गांव पहुंचने पर अपने दोस्त के घर पर बिजी चारपाई पर मैं बैठ गया था।
कुछ बच्चे मैदान में खेल रहे थे 
क्यों न  कुछ श्याम के बारे में पूछा जाए
मेरे पहुंचने पर बच्चे ने जवाब दिया कि 
श्याम काक
अभी बाजार गए हैं 
मैंने पूछा क्या लेने गए।।
बच्चे ने उत्तर दिया कि।
उनके परम मित्र आने वाले हैं।
जो कि।
उनके लिये।
कुछ लाने वाले हैं।
मैंने सोचा कि मेरे पास सब कुछ है क्या लाएये। वह

हो सकता है।
बह
कुछ मिठाईयां या फल फ्रूट लेने गया होगा।
मैं कुछ समय इंतजार कर कर।
वापिस।
थकान होने के कारण।
शाम की खटिया पर लेट गया क्योंकि।
यही सोच रहा था कि।
हालांकि मैं खुद आत्म स्वाभिमान।
होने के कारण किसी दूसरे के पास नहीं जाता था।
लेकिन मेरी आत्मा ने अलग विचार करने के कारण कुछ अलग ही सोच दी थी।
अगले पल मुझे कुछ अलग ही देखने को मिला था कि ।
मेरे माता-पिता को साथ में लिए हुए।
घर पर पहुंच चुका था।
भूली बिसरी बातें मेरे दिमाग से हट चुकी थी।
यह बात मेरे दिमाग में फिर आना शुरू हो गई थी।
मेरा नाम अजीत राय था।
मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान था।
बहुत मन्नते और देवी देवताओं की मन्नतें मांगने पर एक बारिश पैदा हुआ था।
जिससे घर वालों को खुशी और साहरे की आस पैदा होती हुई थी।
पर लिखने- पढ़ने पर मेरे मां बाप ने गांव  से शहर की तरह लिखने पढ़ने भेज दिया था हालांकि । मेरे मां बाप की  आर्थिक हालत बहुत खराब थी लेकिन। उन्होंने जमीन जाय-धात कम होने के कारण भी मेरी पढ़ाई पर विशेष ध्यान।दिया
साथ ही स्वयं दूसरे की मेहनत मजदूरी कर कर मेरी पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया और मेरा मनोबल भी कम नहीं था। मैं सभी पढ़ाई हूं मैं विशेष ध्यान देते हुए बीए( आर्ट्स कॉमर्स ) फाइनल पास कर लिया । और मेरा नंबर सेकंड ग्रेड टीचर में सिलेक्शन हो गया।
जिससे  मेरे मां - पिता को खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
और मेरी ड्यूटी कहीं बाहर लग गई हालांकि मैं अपने माता-पिता को टाइम टू टाइम पोस्ट के द्वारा अपनी खबर भेज ता राहा।
लेकिन वो कहते हैं कि प्यार किसी को बताकर नहीं आता ।
मैं जो अपने मकान के पास में रहने वाली ।
सरदा जो कि कुछ b.a. फाइनल कर रही ।
मेरे से हर रोज एग्जाम या उससे संबंधित प्रश्नों के बारे में मेरे से पुचती रहते थे कि।
कौन से प्रश्न आएंगे या किस बारे में आएये।धीरे- धीरे
सरदा से मेरा प्यार बढ़ता गया।
और हम दोनों ने लव मैरिज कर ली।
बिना किसी अपने मां- पिता को बताऐ। बिना अलग से ही दुनिया बसा ली।
नही मां-पिता की खबर लेता था। और बहुत दिनों से अपने गांव भी नहीं गया था।
मां- पिता अपना जैसे तैसे गुजारा चला रहे ।थे
एक रोज अजीत राय के पिता श्याम से मिलने आए तो श्याम ने पूरी बात उनके पिताजी को बताई।
 श्याम ने कहा काका आज अजीत राय यानि मेरे परम मित्र आने वाले आप दोनों मेरे साथ चलिये।
मां-पिता की हालत और उनको सामने देखकर मेरी आंखें भर आई । मां- बाप बच्चों के लिए इसलिए पढ़ाते-लिखाते और खुद सब कुछ सहन करते रहते हैं। अपने बच्चों के लिये ताकि उनका ख्याल रख सके। और बुढ़ापे का सहारा बने। मैं कितना खुदगर्ज निकला।
आंखों से मेरे असुधारा बह निकली। माता- पिता को अपने साथ चलने को कहा। और श्याम को भी धन्यवाद दिया।
शायद श्याम के पास नहीं आता तो। मैं अपने आप को कभी नहीं माफ कर पाता।
    
                   धन्यवाद.......


      लेखक   -  रमेश बाबू









A person cheating -

गुरुवार, 9 नवंबर 2023

बच्चों की सोच मां-पिता पर निर्भर करती है। या बच्चों का भविष्य का निर्माण कर्ता माता- पिता ही हैं।


जहां मनुष्य अपने जीवन को संवारने में तथा अपने परिवार की आर्थिक, सामाजिक स्थिति तथा परिवार को खुश रखनेे का निरंतर प्रयास करता ही रहता हैै। यह सब कुछ करतेेे रहने में यह भी पता नहीं पड़ता है । कि बच्चोंं की बच्चोंं पढ़ाई लिखाई, शादी, विवाह बच्चों के बच्चे जीवन निरंंन्तर ही निकलता चला जाता है । लेकिन कुछ इसमें सीखनेेेेेेेे लायक बात यह है । अपने बच्चों की भविष्य की हर एक व्यक्ति चिंता करता है। या करनेेे लायक भी है ।
लेकिन इससे मात-पिता को सीखने लायक बात यह है। कि - हर एक पिता या मां-बाप अपने बच्चों के भविष्य के लिए करता है। लेकिन 
बच्चों को सुधारने के लिये -  सुधारने के लिए माता-पिता स्वयं जिम्मेदार क्योंकि अपनों से बड़े या पूर्वज कहते है कि=
पूत( पुत्र या पुत्रियां) के गुण  पालना( एक तरह का झूलने वाला झूला) में ही दिख जाते हैं।
लेकिन इसके साथ भी बच्चों में आत्मनिर्भरता तथा स्वयं की जिम्मेदारी को समय तथा समय के विस्तार को भी समझना होगा।
क्योंकि अभी बह स्वयं बच्चे हैं।  लेकिन यह जिम्मेदारी भी या पिता या माता की जिम्मेदारी भी आगे जाकर खुद को भी निभाना है। या स्वयं को निभाना।
यह गुण बचपन से ही आरोपित या समझना होगा।
जिस की काबिलियत हो गुना का निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी
चलता ही रहे ताकि = बेटा बाप बनने से पहले अपनी पीढ़ी में शुद्धिकरण और सुधार ला सके।
क्योंकि बह स्वयं भी में पहले किसी का बेटा था अभी किसी का पिता है । अगर यह क्रिया हर व्यक्ति या पिता अपनाते हैं । तो समस्या परे से बाहर ही रहेगी । अपितु गुणों का विकास  भी संसारी जीवन पर आधारित करता या जीवन के आधार पर निर्भर करता है। 
जिसका आधार बताने योग्य नहीं- वह स्वयं पर या कल्चर आधारित रहता है । जिसको हम से स्वयं या सामाजिक की स्थिति देख रहे हैं।


                                               लेखक - रमेश बाबू

मंगलवार, 7 नवंबर 2023

लक्ष्य - सफलता से दूर क्यों ?

मनुष्य हर एक सफलता पाने की इच्छा रखता है। जो कि रखना भी जरूरी है। लेकिन जितनी बड़ी इच्छा रहती है। उतना ही बड़ा जोखिम या परेशानियों का सामना करना पड़ता है। एवं शारीरिक, मानसिक बे आर्थिक परिस्थितियों को अनुकूल बनाकर चलना पड़ता है । किंतु मनुष्य जोखिम या रिक्स भी नहीं लेना चाहता है।तथा उसे कार्य को सफलता की दृष्टि से देखता रहता है। जो संभव नहीं है। जिस तरह पका हुआ आम खाने की इच्छा रखते हैं। तो पहले पौधे को अनुकूलित वातावरण चारों तरफ पौधे के लिए सुरक्षा कवच अपनी देखरेख एवं बड़ा होने पर फल एवं पकने का इंतजार करना बहुत जरूरी है। उसी तरह जिस कार्य को हम करते हैं। या करने वाले होते हैं। उसका तुरंत परिणाम या मिलने की इच्छा से नहीं करना चाहिए। साथ यह निर्धारित करता है। कि तुमने जिस कार्य को या जिस लक्ष्य को चुना है। उसे कार्य में जो खामियां या कमियां होती है। उसी की पूर्ति के ही लिये व्यक्ति को प्रॉफिट या लाभ मिलता है। जो स्वयं पर निर्धारित करता है। कि हम इस कार्य या खामियों की पूर्ति करने योग्य है। या नहीं है।


 
        लेखक - रमेशबाबू

रविवार, 8 अक्टूबर 2023

आंखें और शारीरिक मानसिकता अनुभव

वस्तुते मानसिक या शारीरिक ज्ञान को पीछे रखने वाले ज्ञान को समझने के लिए मानवीय शक्ति को नियंत्रित करने के लिए मानसिक या शारीरिक आंखों को नियंत्रित करने का ज्ञान किसी भी चीज को यह हैंडल या चलाने के लिए व्यक्ति सीधे हाथ का प्रयोग करता है। वही प्रक्रिया अगर व्यक्ति आंखें बंद कर या आंखें मूंद कर दोहराने की प्रक्रिया करता है। तो सीधी आंख तरफ गतिमान ज्यादा रहता है जबकि दाएं तरफ घूमने की प्रक्रिया कम रहती है।

बुधवार, 27 सितंबर 2023

लघु कहानी - बारिश की आश

पाठ विशेष - रघु को अगर राधा( मां) और श्याम(पिता) उससे ज्यादा लाड प्यार या समय रहते। उसमें सुधार क्या होता तो नहीं तो रघु की मौत होती । नहीं श्याम और नहीं राधा की। कमी कुछ इसमें मां-बाप की शिक्षा देने में होती है। जो की बचपन में समय-समय पर सुधार की जरूरत होती है। स्वयं राधा और श्याम की कमियों साथ ही रघु ने भी लाड प्यार का नाजायज उपयोग कर गलत रास्ते की तरफ चल दिया था। जिससे तीन जिंदगी मौत के काल  में समा गई । आइये - लघु कहानी के माध्यम से विस्तार से समझते हैं।
 
शहर से दूर काली सिंधी नदी के किनारे पहाड़ियों के बीच बस रामपुर नाम का गांव था। लंबे- चौड़े खेत कल्हान पूरी तरह खुशहाल था। इस गांव में राधा और श्याम नाम के दंपति जीवन व्यतीत करते थे। सब कुछ होने के बावजूद नहीं था तो केवल एक वारिस।
मंदिर चढ़ावा, पंडित पुजारी, औझाओ़ आदि। सब किया । किंतु अभी तक संतान नहीं हुई थी। इधर उम्र का पड़ाव भी धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। लाक मन्नते करने के बाद एक संतान या उनके घर एक बच्चे का जन्म हुआ। जिसका नाम रघु रखा गया। रघु मां बाप का इकलौता दुलारा था। उसे कोई भी चीज या वस्तु के लिए तरसना नहीं पड़ता था। प्यार दुलार मिलता रहा और इधर मां-बाप की उम्र ढलती गई। किंतु रघु के  शैतानी या शरारत करने पर उसके पिता(श्याम) डांट फटकार लगाते रहते थे। किंतु राधा के प्यार ,दुलार उसे 
पूरी तरह बिगाड़ दिया था। धीरे-धीरे बड़ा होने पर नशा या शराब का आदी हो गया। और आए दिन लड़ाई झगड़ा और दिन प्रतिदिन बिगड़ा ही चला गया। श्याम के बहुत समझाने पर भी उनकी बातों पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया । और श्याम राधा को कोसता रहता है कि तुम्हीं ने ही इसको सर पर चढ़ा रखा है। और राधा श्याम को समझाकर कहती है ।कि अभी वह नादान है। जल्दी समझ आ जाएगी । किंतु रघु अपनी शरारतों और लड़ाई झगड़ों से बाज नहीं आ रहा था। कभी दोस्तों के साथ मौज मस्ती, अपनी बाइक की मोटरसाइकिल द्वारा फालतू इधर-उधर घूमना। एक दिन रघु बाजार से शराब में दूत होकर गांव जा रहा था। नशे में कुछ होश नहीं होने से एक ट्राले ने टक्कर मार दिया। और वह घायल होकर वहीं गिर पड़ा। जब यह बात राधा और श्याम को मालूम पड़ी तो बे पास ही के सिटी हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। जिससे सर पूरी तरह डैमेज हो चुका था। एक हाथ और एक पर भी टूट चुका था। डॉक्टर द्वारा ना ही जवाब मिला था।या इसके बचने के चांस बहुत कम है। इधर रघु के दिन प्रतिदिन अलग-अलग ऑपरेशन होते रहे। उधर श्याम पैसों का बंदोबस्त कर कर थक चुका था। या लाखों रुपया लगा चुका था ।अपने पास जो पूंजी थी पूरी लगा चुका था। अपनी जमीन भी बेचना पड़ा। किंतु रघु के इलाज में कोई भी फर्क नहीं पड़ा था । और एक दिन राधा और श्याम को अपने जीवन में वह दिन देखना पड़ा जिसे उन्होंने सपनों में नहीं सोचा था। यानी रघु की मौत का राधा रो रो कर बेहोश हो गई। श्याम भी इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सका और दिन प्रतिदिन बीमार होता ही गया। और एक दिन श्याम भी मौत की नींद सो गया। और श्याम के गम में राधा की भी मौत हो गई।

                                    लेखक - रमेशबाबू


गुरुवार, 21 सितंबर 2023

गरीबी या बुरा वक्त कब, क्यों, कैसे? -

मनुष्य अपने जीवन में कार्य या कार्य गति को पूर्ण करने के लिए या अपनी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दबदबा कायम करने के लिए। या सक्षम होने के लिए समय, परिस्थिति के अनुकूल बुद्धि( दिमाग) का उपयोग करता है। लेकिन कुछ कार्या का समय परिस्थिति या दिमाग का गलत इस्तेमाल या अविवेकपूर्ण उपयोग करने पर। गलत परिणाम या कार्य के विपरीत परिणाम मिलता है। जिस व्यक्ति की मानसिक बुद्धि विपरीत दिशा की और कार्य करने लगती है। किसी के समझाने पर भी या कोई दूसरे आदमी के द्वारा सही दिशा या सही ज्ञान देने पर। स्वयं के विपरीत मानकर । अपनी अबुध्दि मन का उपयोग करने लगता है। जिस कार्य, समय, व्यर्थ होते हैं। साथ में ही दिन - प्रतिदिन गरीबी और बुरा वक्त आना भी शुरू हो जाता है। जिससे वह भाग्य और स्वयं को दोस देता रहता है। साथ ही इन सब कारणों के, जिम्मेदार तीन तत्व शामिल होते हैं। क्यों , कैसे और कब ।

🌧️ 1. क्यों आता है गरीबी और बुरा वक्त

गरीबी या बुरा वक्त अचानक नहीं आता, बल्कि यह कई कारणों का परिणाम होता है —

1. कर्मों का परिणाम:
जैसे पेड़ वही फल देता है जो बीज बोया गया हो, वैसे ही मनुष्य के कर्म ही उसके भविष्य का निर्धारण करते हैं। मेहनत, सत्य और संयम से किया गया कर्म सुख लाता है, जबकि आलस्य, अहंकार या गलत रास्ता बुरा वक्त लाता है।


2. परिस्थितियों का खेल:
कभी-कभी व्यक्ति कितना भी परिश्रमी हो, लेकिन समाज, राजनीति या प्राकृतिक विपत्तियाँ (सूखा, महामारी, मंदी) उसकी आर्थिक स्थिति को बिगाड़ देती हैं।


3. अज्ञानता और निर्णयों की गलती:
गलत समय पर गलत निर्णय, जैसे — अनावश्यक खर्च, गलत निवेश, या शिक्षा की कमी — व्यक्ति को धीरे-धीरे गरीबी की ओर ले जाते हैं।
---

🕰️ 2. कब आता है बुरा वक्त

बुरा वक्त किसी को चेतावनी दिए बिना आता है, परंतु उसके आने से पहले कुछ संकेत मिलते हैं —

1. जब मनुष्य घमंड में आकर दूसरों की मेहनत को छोटा समझने लगे।


2. जब परिश्रम की जगह भाग्य पर निर्भर हो जाए।


3. जब सही मार्ग छोड़कर आसान लेकिन गलत रास्ते चुनने लगे।


4. जब संबंध, विश्वास और ईमानदारी टूटने लगें।



बुरा वक्त अक्सर तब आता है जब मनुष्य अपने अच्छे वक्त को संभालना भूल जाता है।
---

🔄 3. कैसे आता है बुरा वक्त

बुरा वक्त धीरे-धीरे जीवन में प्रवेश करता है —

पहले कमाई घटती है,

फिर खर्च बढ़ते हैं,

उसके बाद लोग साथ छोड़ने लगते हैं,

और अंत में आत्मविश्वास डगमगाने लगता है।


लेकिन यहीं से पुनर्जन्म की शुरुआत होती है।
जो व्यक्ति अपने बुरे वक्त में धैर्य, सच्चाई और मेहनत नहीं छोड़ता —
वही एक दिन ऊँचाइयों पर पहुँचता है।


''मेरी सोच''

लेखक - रमेशबाबू

शनिवार, 16 सितंबर 2023

विध्वंसकारी या स्वयं हितकारी भाषा ज्ञान -

हर मनुष्य भाषा का प्रयोग करते हैं ।जिससे कि दूसरा व्यक्ति उसी ही भाषा के रूप में जवाब दे सके। किंतु मनुष्य को समय ,जगह ,व्यक्ति( स्त्री, पुरुष) की मंशा या परिस्थिति के अनुकूल ही भाषा का प्रयोग करना चाहिए। जिसका अंदाज हम उसके हाब- भाब,  बोल-चाल या उसके चेहरे से पता लगाया जा सकता है। जिससे कि उसकी मानसिकता को आगत या बुरा सुनने को या प्रतिकूल परिणाम न निकले। यदि कोई व्यक्ति मानसिक या शारीरिक या किसी चीज के लिए दुखी अफसोस कर रहा हो। उसी समय अगर अगर दूसरा व्यक्ति खिल्ली या मजाक जनक कष्टदायक भाषा का प्रयोग करता है । है तो उसके मन मस्तिष्क में आगत लगता है ।इसका मतलब है कि- किसी विस्फोटक चीज को रखकर तिल्ली(आग) जलने का काम स्वयं का रहता है। मतलब जानबूझकर आपत्ति मोल लेना है। या स्वयं या दूसरे व्यक्ति से लड़ाई- झगड़ा निश्चित है।
जबकि इसके विपरीत किसी किसी निराश, दुखी व्यक्ति के को मृदु भाषा द्वारा उत्साहित सात्वनां या मदद की जाए तो। उसकी मन बहुत प्रकुल्लित, या डूबते को तिनके का साहरे की जरूरत की तरह काम करता है। किंतु अगर कोई भी व्यक्ति को हम किस भाषा या ज्ञान के द्वारा उसको समझने का प्रयत्न करते हैं। अगर वह क्रोधित या अहंकार का रूप धारण करता है।तो या कोई बात मानने को तैयार नहीं है। तो उसको समझाना बेकार है। जिससे कि स्वयं का समय तथा ज्ञान बहिष्कारी माना जाऐगा।

रविवार, 3 सितंबर 2023

परिवार का मुखिया या स्वयं निर्णायक ( सामाजिक एवं पारिवारिक) - लेख

मनुष्य जीवन में परिवार का मुखिया परिवार को चलाने वाला चालाक एवं इंजन का काम करता है। तथा परिवार रूपी डिब्बे होते हैं 
जिसे चलाने के लिए शारीरिक एवं मानसिक कार्य की प्रक्रिया से परिवार के मुखिया को गुजरना पड़ता है। क्योंकि वह इंजन और चालक दोनों का काम करता है।
बह हमेशा तथा इंजन तथा इंजन से जुड़े डिब्बो को सही दिशा या सही रास्ता दिखाने का कार्य करता है। हमेशा वह आर्थिक एवं सामाजिक परंपरा की स्थितियों का आकलन। या किसी भी स्थिति में धन उपार्जन करना एवं समाज के प्रति जो कार्यों होते हैं उनका का पालन। तथा कठिन परिस्थितियों में स्वयं तथा पारिवारिक सदस्यों को धेर्य बनाकर रखना। जो की हर समय शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयों से होकर गुजरना पड़ता है। जो की एक चुनौतियां पूर्ण जीवन होता हे। जीवन को सही राहे एवं सही दिशा देने के लिऐ। परिवार के सभी सदस्यों से
कोई भी या अन्य कार्य करने से पहले सहमति एवं सही राय लेकर ही कार्य को आगे बढ़ना चाहिए। जिससे कि कार्य को सही दिशा मिल सके। क्योंकि उसमें अलग-अलग आत्मज्ञान का प्रयोग होता है। जो व्यक्ति या जो मुखिया अविवेकपूर्ण या जल्दबाजी में कोई  निर्णय
लेता है। वह कभी भी सफल कार्य को सही रूप नहीं दे पता है । बह स्वयं तथा पारिवारिक लोगों को आर्थिक या सामाजिक स्थिति को गलत मोड़ दे देता है। जिसके चक्रव्यूह से निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है। या आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति को हानि पहुंचा देता है।
              
                                  लेखक - रमेश बाबू


गुरुवार, 31 अगस्त 2023

Maa The Great (life biography) -

 प्रकृति का संतुलन बनाने के लिए परमात्मा द्वारा जन्म मृत्यु का अंतराल रखा गया है। या जीव - जंतु में पेड़ - पौधे समय सीमा सुनिश्चित की गई। मनुष्य जीव उत्पत्ति में तीनों अहम भूमिका होती है
1.विधाता   - परमपिता परमात्मा
2. जन्मदात्री- जन्म देने वाली मां
3. जन्मदाता- पालन पोषण करने वाला पिता
परमपिता परमात्मा का अलावा दूसरे स्थान जो आता है वह मां का होता है।
मनुष्य हो या जीव - जंतु लेकिन जो मां होती है। अपने बच्चों के लिए सब कुछ समर्पित करने का भाव या बच्चों की रक्षा हेतु दूसरे मनुष्य या जीव जंतुओं से लड़ने साहस भी रखती है।
जीव उत्पत्ति के बाद में बालक में मां का शब्द का विवरण - जीवात्मा डालने से ही पहले परमात्मा( ब्रह्मदेव) जन्म - मृत्यु, कुल ,कार्य , बिकार आदि विशेषताएं। कब कैसे और क्यों उसकी मृत्यु होगी का लेखा-जोखा जीवात्मा के सामने किया जाता है।
जीवात्मा परमात्मा से सवाल करती है। कि यह परमात्मा जो यह मेरा वजन अपने पेट में रखकर या उसके पेट में लात मार रहा हूं बह  फिर भी अपना कार्य सही रूप से करने वाली कौन है? प्रत्यक्ष रूप से बताइए
परमात्मा - कहते हैं कि यही तेरी मां है जो तेरे को 9 महीने अपने पेट में रखकर रक्त से सिंचित करती रहती है! और तेरे सांसारिक जन्म लेने पर तेरे रोने पर निशतन पान करावेगी । जो तेरे बड़े होने के लिए उपयोगी है। तेरे रोग ग्रस्त होने पर वह सब कुछ न्यौछावर कर देगी।
तेरे पिता - तुझे अपने सीने से लगाकर लाड - प्यार करेगा।
जीवात्मा परमात्मा से फिर सवाल करती है। कि यह पिता क्या होता है।
परमात्मा - तेरे पिता तेरा लालन पोषण प्यार और आर्थिक जरूरत को पूरा करेगा।
है जीवात्मा सांसारिक या मृत्यु लोक में जाने के बाद इंद्रियों के अधीन होकर अपनी मां - पिता को दुखी और निराश मत करना। यही तेरा पहला कर्तव्य है। क्योंकि वे तेरे जन्म से लेकर उनकी मृत्यु तक तेरे लिये शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयों से गुजरते हैं।
और
  गुरु तेरे को सद्मामार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा।
जिससे तेरे को जन्म- मरण योनियों से मुक्ति मिल जाएगी।
लेकिन है। यह सब ज्ञान, युक्तियां सतलोक तक ही सीमित है। तेरा मृत्यु लोक में जन्म होने पर यह सब ज्ञान रहस्य वातावरण के अनुसार तू सब कुछ भूल जाऐगा

जीवात्मा- है सृष्टि के स्वामी है मुझे एक कोई ऐसा वरदान दो। कम से कम दो शब्दों का तो ज्ञान दो। जिससे कि मैं बालक रूप मे भूख या कोई शारीरिक कष्ट होने पर किस पुकारू या किसे कहूं यह कैसे कहूं कुछ शब्दों का ज्ञान दो।
परमात्मा - है जीवात्मा तेरे कहना का तात्पर्य भी सही है। तेरे मुंह से जो पहला शब्द निकलेगा। बह मां कहलायेगा।
लेकिन जो आत्माएं यह वरदान नहीं मांगती है। बह जीवन भर  गूंगी ,बेरी रहेगी।

                                      लेखक - रमेशबाबू

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

झिझकता पूर्ण जीवन ( जीवनी) - लेख

भौतिक संसाधनों को या जीवन में काम आने वाली वास्तुओं को हर समय हर जगह सभी चीजों को नहीं रख सकता। या साथ में रखकर नहीं चल सकता। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये। एक दूसरे पर निर्भर रहना ही पड़ता है। जो की एक सत्यता पूर्ण बात है।

लेकिन इस संसार में बहुते ऐसे व्यक्ति है ।जो दूसरे व्यक्ति से चीज वस्तु या आर्थिक मदद मांगने से अपने आप में शर्मिंदगी या झिझकते हे। 

जैसे- श्याम कोई चीज या वस्तु देगा या नहीं देगा शायद उसके पास होगी या नहीं होगी। या वह मना करने पर और व्यक्तियों के सामने मेरे को शर्मिंदा होना पड़ेगा। यही विचार करने पर वे दूसरे व्यक्ति के पास जाने से कतराता रहेगा। या अपनी बात नहीं रख पाता।

लेकिन बह यह नहीं समझता है। कि - श्याम के मना करने पर श्याम के पास खड़े व्यक्ति भी किसी भी वस्तु या चीज को मांगने से पहले स्पष्ट रूप से उनके सामने बात को रखना चाहिए ताकि वे स्वयं भी उसे बात को सक्रिय भाव से ले और मदद कर सके।

जिससे भौतिक संसाधन या आर्थिक की कमी के कारण कार्य में दिन - प्रतिदिन उसके कार्य में बाधाये आती ही रहयेगी। ने की बाधाओ की कमी होगी।

                                              लेखक - रमेशबाबू


 


मतभेद या रिश्तो का पतन (जीवनी) - लेख

जीवन में रिश्तों की बुनियाद एक कच्चे धागे की तरह होती है। चाहे वह रिश्ता किसी तरह का हो। लेकिन ज्यादातर रिश्ते सख रुपी बुनियाद वे आपसी मतभेदों के कारण ज्यादातर टिक नहीं पाते हैं। जिससे पुराने से पुराना रिश्तो में आपसी दरार आ जाती है। या यूं कहे की कच्चे धागे को दोनों तरफ से खींचने पर वह टूट ही जाता है। जिसे आसानी से जोड़ना या दरार को भरना बहुत ही मुश्किल होता है। लेकिन नामुमकिन नहीं। लेकिन उन रिश्तो की बुनियाद इतनी मजबूत नहीं रहती है। जितनी कि पहले थी। थोड़ी सी हवा या किसी दूसरे गलत व्यक्ति द्वारा झूठी अफवाह द्वारा ही दोनों के रिश्तों पतन हो जाता है। बही रिश्ता एक दूसरे के शत्रु के समाने नजर आते हे। जबकि अगर एक व्यक्ति अपवाह या अफवाह से संबंधित खोजबीन कर उसके कारण का पता लगता है। या जिस व्यक्ति ने अफवाह फैलाई उस व्यक्ति को दोनों पक्षों के सामने लाकर शक्ती से पूछा जाये। और कारणों का पता लगाया जाये। जिससे कि रिश्ता टूटने से पूर्ण रूप से बच जाऐ।

                                         लेखक - रमेशबाबू

बुधवार, 23 अगस्त 2023

शरीर की बाहरी एवं आंतरिक आत्माओं का संघर्ष - आध्यात्मिक ज्ञान (लेख)


मनुष्य के शरीर में दो तरह की आत्मा निवास करती है बाहरी एवं आंतरिक
=1.बाहरी यानी सांसारिक सुख
=2. आंतरिक यानी स्वयं एवं शारीरिक सुख
 शरीर की दो बेटियां = आंतरिक एवं बाहरी।

     =  जन्मदाताशरीर( बाप)
     1. आत्मा    - आंतरिक ( बड़ी)
     2.आत्मा     -  बाहरी( छोटी)


मनुष्य कोई भी कार्य करने से पहले अपने आप से या स्वयं से यह निर्णय लेता है कि यह कार्य(काम) होगा या नहीं होगा या यह कार्य ( काम)अच्छा है या बुरा है। यही सोच में बहे डूबा रहता है।इसी बीच बह बाहरी और आंतरिक आत्माओं से अपना निर्णय लेगा। इसी के साथ ही शरीर इन दोनों का बाप है
1.बाहरी(उपरी) 2. आंतरिक( अंदर)

1.बाहरी= बाहरी आत्मा जो हम देखते हैं ।यह स्पर्श करते। या किसी चीज का स्वाद, यानि सांसारिक सुखों वाली होती है। जो शरीर और आंतरिक आत्म का साथ ने देकर स्वयं का ही हित चाहती है।
जो सांसारिक सुखों के चक्कर मे बाप(शरीर),
बड़ी बहन आंतरिक आत्मा दुख देने में कोई कसर नहीं छोड़ती जो इंद्रियों (काम ,क्रोध, मद ,लोभ) के अधीन होकर बाप( शरीर) स्वार्थ रूपी लालच देकर बस में रखती रहती है।
जिससे वह स्वयं का विनाश करती है । साथ में अपने बाप( शरीर )लेकिन आंतरिक आत्मा अजर अमर है।

आंतरिक आत्मा जो अपने अध्यात्मिक ज्ञान से अपनी छोटी बहन( बाहरी)  अपने पिता( शरीर) को पूर्ण रूप से समझाने का प्रयास है।

2.आंतरिक आत्मा जो भोग - विलासिता  या इंद्रियों के अधीन ने होकर सत्य कर्म तथा बाप( शरीर )की तरफ ध्यान देकर बाहरी आत्मा को बार-बार समझाने की राय देती रहती है। की सांसारिक सुखों की तरफ ध्यान मत दे । यह लुभाने एवं भ्रमित स्रोत है ।जो पल भर के लिये तो सुख देते हैं। लेकिन जीवन भर के लिऐ दुखों का कारण भी यही बना जाते। इसमें मेरा कुछ नहीं जाता। शरीर(पिता) और बाहरीआत्मा तुम दोनों का ही विनाश है ।


                                               लेखक - रमेशबाबू
                                



       

मंगलवार, 22 अगस्त 2023

बच्चों का बचपन या निर्माण - लेख

सभी माता-पिता को अपने जीवन बच्चों का इंतजार रहता है। या आते हैं। जिससे उन्हें खुशी या गर्व महसूस करते हैं। जिससे उन्हें यह अपने बच्चों से भविष्य में बहुत आशा रहती है। या रखते हैं।
साथ ही अपने बच्चों का जीवन सुधारने के लिए सब कुछ करते हैं। या करते रहते हैं।
जिससे कि स्वयं से ज्यादा सामाजिक आर्थिक स्थिति में हमेशा आगे रहे।
लेकिन इन सब मैं  माता-पिता स्वयं अहम भूमिका निभाते है। कि बच्चों का भविष्य किस तरह रखना है ।या कैसा रखना है। जिस अगर किसी नये मकान का निर्माण किया जाए तो उसकी आधारशिला नींब पर ही निर्भर करती है। उसी प्रकार जो संस्कार या गुण बच्चों में बचपन से या बचपन में अंकुरित किया जाता है।
वही संस्कार धीरे-धीरे विकसित होते चले जाते हैं। जो एक भविष्य की आधारशिला बन जाता है। या दिखाई देते हैं।
जिस तरह गीली  मिट्टी से कुम्हार या बनाने वाला जो चाहे उसका रूप, आकार दे सकता है।
मिट्टी से बनी वस्तुओं को अगर पका दिया जाये।
उसमें कोई भी संशोधन नहीं किया जा सकता है।
संशोधन या परिवर्तन करने पर मिट्टी से बनी वस्तुएं टूट जाती है। उसी प्रकार बच्चों के जवान या बड़े होने पर संस्कार या गुणों का संशोधन नहीं किया जा सकता है। या करने पर रूस्ट हो जाते या दुखी हो जाते हैं।

                                     लेखक - रमेश बाबू

रविवार, 20 अगस्त 2023

मनुष्य से मनुष्य पर मानसिक चोट -(लेख)


हम सभी जानते हैं । कि जितना सुलभ मनुष्य जीवन मानते हे। उतना हे। नहीं सभी एक समान जीवन व्यतीत नहीं करते। कितने ही मनुष्य को समय से ही दुखों  या कठिनाइयां सहन करने की आदत सी हो जाती है।
लेकिन जो पहली बार अपने जीवन में देखता है। तो
बह भयभीत सा हो जाता है। और आने वाली कठिनाइयों को पूर्ण रूप से सामना नहीं कर पाता है।
जिससे बे आर्थिक या सामाजिक नुकसान को सहन नहीं कर पाता है। और अपने मन मस्तिष्क में छवि या कार्य को बार-बार महसूस करता रहता है।
जिस तरह किसी मोबाइल में पासवर्ड डालकर भूल गए हो। और उठते बैठते खाते-पीते नींद भी अच्छी तरह नहीं आती जिससे हरदम - हरपल बेचैनी महसूस होती रहती है। या करता रहता है। अपने जीवन को या जीवन जीने का लक्ष्य सुन्य मान हो जाता है। या मानने लगता है। तथा अपने द्वारा किए गए कार्य में रूचि नहीं लेने से गलती पर गलती करता रहता है।
जिसे मनुष्य कुछ अलग ही रूप दे देता है। या पागल समझने लगता है।
लेकिन ऐसा करने पर मनुष्य या मनुष्य के द्वारा किए गये कार्य या समय को वापस नहीं लाया जा सकता है।
यह उसकी स्वयं की भूल यह हे। अपने या अपने द्वारा किए गए कार्य या समय को वापिस मुड़कर नहीं देखना चाहिए क्योंकि समय जो चला गया है ।वह वापस नहीं आएगा या अपने द्वारा या किसी के द्वारा पहुंचा गई चोट किए गए कार्य को वापस नहीं लाया जा सकता है। तथा हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए भूतकाल का पछतावा कभी नहीं करना चाहिए।
गीता जी में श्री कृष्ण भगवान ने कहा कि-- वे स्वयं ही भूतकाल, वर्तमान काल तथा भविष्य काल का प्रतिनिधित्व. करते हैं।


नशा या स्वंय का विनाश (लेख)


मनुष्य ने या जिस जीव ने धरती पर जन्म लिया हर चीजों या हर व्यक्ति से उसके व्यवहार या परिणाम से भली-भांति परिचित है।
किंतु देखकर भी अनजान बना रहता है।
जैसे कि किसी हिंसक जीव जंतु के पास जाएंगे तो या तो बह काटेगा या खायेगा। फिर भी देख सोच कर भी अनजान की तरह मौत के मुंह में जाने से वंचित नहीं रहते। कहते है कि- जानबूझकर आफत मोल लेना।
किसी भी तरह का नशा करने वाला व्यक्ति सब कुछ( घर परिवार, मात-पिता स्त्री, बेटा- बेटी) त्याग सकता किंतु अपनी गलत आदतों या नशे का त्याग कभी नहीं करेगा।चाहे उसके परिवार को दो वक्त की रोटी नसीब न
हो।
 नशे को सब कुछ मान चुका होता है।
यह एक तरीका विकार है । जो स्वंय के साथ-साथ से परिवार सहित दुखी रहता है।
जिससे स्वयं की आर्थिक, सामाजिक ,शारीरिक जीवन को कष्ट प्रदान करता है। तथा असमय ही मृत्यु को या दर्दनाक मौत को आमंत्रित करता है।
जिसका खामियाजा(दु:ख) परिवार के सदस्यों को उठाना पड़ता है।पारिवारिक व्यक्ति अपने जीवन को कोसते रहते हैं। कि शायद में उसकी संतान या भाई नहीं होता तो यह जीवन देखने को नहीं पड़ता।
मनुष्य चाहे  जिस तरह अपने जीवन को रहन-सहने स्तर है। 
रख सकता या अच्छा जीवन व्यतीत कर सकता।
क्योंकि सब कुछ पृथ्वी पर आने पर ही व्यक्ति संगति या साथ रहने का भी पड़ता है। यह आप स्वयं पर निर्भर करता है ।  साथ ही उसमें विवेकशील , दिमाग ,मन कंट्रोल रखने की क्षमता ही मनुष्य में सर्वोपरि है । 
                             
                                      लेखक - रमेश बाबू



कहानी - मतलबी दुनिया

स्वयं पर विश्वास क्यों?

स्वयं पर इतना विश्वास रखो कि तुम जिस कार्य को करने का निश्चय करते हो, उसे पूर्ण करके ही छोड़ो। क्योंकि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति ...

कहानी = मतलबी दुनिया नारी विशेष