प्यार, स्नेह वह लगाव है। जो जात-पात उच- नीचे छोटे बड़े को देखकर नहीं किया जाता है। वे केवल जिससे करना या जो करना चाहता है। उस व्यक्ति वह गुण होना चाहिए। ताकि वह दूसरों को अपनी तरफ आकर्षित या दूसरे व्यक्ति को प्रभावित कर सकें। जिसमें पवित्रता होती है। जिसे नकारा नहीं जा सकता।Aaa
किंतु आज के भौतिकता भरे जीवन मे अपना उल्लू सीधा करने के लिए भी व्यक्ति इन शब्दों का दुरुपयोग ही नहीं अपितु जीवन में भी अपना रहा है। जिसे हर कोई नहीं समझ पाता है। क्योंकि दिकने और दिखबे भरे शब्दों के जाल मेंफंसकर। अपना तन,मन,धन दूसरे व्यक्ति के प्रति समर्पित कर देता है। जिससे कि उसे इस बात का पता चले किंतु इससे पहले ही वह सब कुछ गवाँ चुका होता है। रिश्तो एवं सपना का महल जो दोनों के सहयोग से बना था। दरार आ चुकी होती है। और मन में नफरत की वह आग जो उस व्यक्ति को जलाने के लिए तैयार थी।Aaa
जिसने छल, कपट, धोखे का सहारा लेकर अपना मकसद पूरा किया। और उसे इस तरह की बुरी परिस्थितियों से लड़ने के लिए छोड़ दिया। जिससे जीवन में एक तरफ कुआ और एक तरफ खाई थी। जिसे खोदने और खुदाने वाला बह स्वयं भी हकदार था। किंतु अब क्या था, जब चिड़िया चुग गई खेत" मन में केवल नफरत का वह सहलाब जो सागर की लहरों से भी ज्यादा ऊंचा उठ रहा था। जो केवल उसे व्यक्ति की बर्बादी यां बर्बाद करना चाहता है। और मन में कई तरह के सवाल- जवाब आपस में टकराते रहते हैं। शायद मेरे द्वारा ऐसा नहीं किया जाता तो ऐसा नहीं हो पाता या उसका साथ नहीं देता तो ऐसा नहीं होता। किंतु यह भी परम सत्य है - कि हर व्यक्ति के मन के अंदर जाकर यह नहीं देखा जा सकता है। यह क्या करने वाला है। तथा आगे क्या कर सकता है। व्यक्ति को उतना ही महत्व दो जितना कि वह उसके लायक है।Aaa
यह मैं नहीं कह रहा हूं यह उसे व्यक्ति की मन की बात है जिसने दूसरे को अपने माना और और अपना सब कुछ दिया। किंतु से बाद में उसे क्या मिला। वह सब जो उसने कभी सोच नहीं रखा था।
महत्वपूर्ण - तुम्हारा निर्णय ही सर्वोपरि है । अच्छा और बुरा भी तुम्हारे हाथों और बातों से होगा।
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