शहर से दूर काली सिंधी नदी के किनारे, हरी-भरी पहाड़ियों के बीच बसा था रामपुर नामक छोटा-सा सुंदर गांव। यह गांव अपनी उपजाऊ जमीनों, लहलहाते खेतों और खुशहाल वातावरण के लिए प्रसिद्ध था। यहां के लोग मेहनती, धार्मिक और एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देने वाले थे।
इसी गांव में श्याम और राधा नाम के एक दंपति रहते थे। दोनों के पास खेती-बाड़ी, पशुधन और घर-संसार की कोई कमी नहीं थी, बस एक ही कमी सालों से उन्हें खाए जा रही थी—संतान की कमी।
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श्याम और राधा ने हर उपाय किया—मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाया, व्रत रखे, पंडितों और ओझाओं से पूजा करवाई—परंतु वर्षों तक उनकी गोद सूनी रही। समय बीतता गया, और दोनों की उम्र ढलने लगी। जब सारी उम्मीदें लगभग समाप्त होने लगीं, तभी भगवान ने उनकी सुन ली—राधा ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया।
उन्होंने उसका नाम रखा रघु।
रघु के जन्म से श्याम और राधा के जीवन में जैसे नया प्रकाश आ गया। उनकी दुनिया उसी के इर्द-गिर्द घूमने लगी। मां राधा अपने बेटे पर जान छिड़कती, और पिता श्याम भी उसे खूब प्यार करते। परंतु जब रघु गलती करता या शरारतें करता, तो श्याम उसे डांट देता, जबकि राधा हमेशा उसे बचा लेती।
राधा का अत्यधिक दुलार रघु को बिगाड़ने लगा।
जहां श्याम अनुशासन में विश्वास रखता था, वहीं राधा को लगता था कि “बच्चे को प्यार से समझाना चाहिए।” यही प्यार धीरे-धीरे रघु को गलत राह पर ले गया।
समय बीता, और रघु जवान हुआ। अब उसमें अहंकार और उद्दंडता बढ़ने लगी। वह दोस्तों के साथ देर रात तक मौज-मस्ती करता, शराब और नशे की लत लग गई। घर में आए दिन झगड़े होने लगे।
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श्याम उसे समझाने की बहुत कोशिश करता, पर रघु हर बात को अनसुना कर देता। वह कहता —
> “बूढ़े हो गए हो बाबा, अब मुझे मत सिखाओ कि क्या सही है और क्या गलत।”
श्याम का दिल टूटने लगा। वह अक्सर राधा से कहता —
> “देख लिया तुम्हारे प्यार का नतीजा? आज यह हमें ही आंख दिखा रहा है।”
पर राधा आज भी बेटे का पक्ष लेती और कहती —
> “अभी जवान है, सुधर जाएगा, समय लगेगा।”
लेकिन रघु सुधरने के बजाय और बिगड़ता गया।
वह गांव के लोगों से झगड़ता, खेतों की फसलों पर ध्यान नहीं देता, और दिन-रात शराब और शोरगुल में डूबा रहता। धीरे-धीरे श्याम की तबीयत गिरने लगी। चिंता और दुःख ने उसे भीतर से तोड़ दिया।
एक दिन जब श्याम ने रघु को शराब के नशे में अपने ही पिता से गाली-गलौज करते देखा, तो उसका दिल भर आया। वह चुपचाप बरामदे में बैठा बोला —
> “जिस संतान के लिए हमने भगवान से मन्नत मांगी, वही आज हमारा दुख बन गई।”
कुछ ही महीनों बाद श्याम का निधन हो गया। राधा पूरी तरह टूट गई, लेकिन रघु पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वह पहले से भी अधिक लापरवाह हो गया। खेत बिक गए, घर गिरवी हो गया, और जो कुछ बचा था, वह भी नशे की भेंट चढ़ गया।
अंततः एक दिन जब रघु सड़क पर नशे में बेसुध पड़ा था, तो गांव वालों ने उसे उठाकर घर पहुंचाया। मां राधा ने रोते हुए कहा —
> “जिसे सर पर चढ़ाया था, वही आज मुझे ज़मीन पर गिरा गया।”
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अब रघु को अपने किए पर पछतावा होने लगा। पिता की डांट और सच्ची चिंता आज उसे याद आने लगी। मगर अब बहुत देर हो चुकी थी।
"समाप्त"
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