शहर के एक पुराने मोहल्ले में गोविंद प्रसाद नाम का व्यक्ति अपनी पत्नी शांति और दो बच्चों के साथ रहता था। कभी गोविंद का जीवन रंगों से भरा हुआ था — सरकारी नौकरी, हँसता-खेलता परिवार और आस-पड़ोस में अच्छी इज़्ज़त। लेकिन समय की करवट ने सब कुछ बदल दिया।
सेवानिवृत्ति के बाद जैसे ही आय का स्रोत बंद हुआ, घर के खर्चों ने धीरे-धीरे उसके रंग छीनने शुरू कर दिए। बच्चों की पढ़ाई, बिजली-पानी के बिल, दवाइयाँ — सब कुछ उसकी पेंशन से पूरा नहीं हो पाता। शांति हर महीने हिसाब लगाते हुए परेशान हो जाती और कभी-कभी दोनों में छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा हो जाता।
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गोविंद का बेटा अमित, जो कभी अपने पिता का गर्व था, नौकरी की तलाश में शहर-शहर भटकता रहा लेकिन किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया। वहीं बेटी रीमा, जो पढ़ाई में होशियार थी, समाज की संकीर्ण सोच के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रह गई। “लड़की को इतना पढ़ाने की क्या जरूरत?” — यह सोच उनके ही रिश्तेदारों ने बार-बार दोहराई, और धीरे-धीरे उस घर में उम्मीद की जगह मायूसी ने ले ली।
आर्थिक तंगी के साथ-साथ सामाजिक ताने भी कम न थे। जो लोग पहले नमस्ते करते थे, अब राह बदल लेते। मोहल्ले में नया घर बनाने वालों की चकाचौंध देखकर गोविंद के दिल में कसक उठती। उसे लगता जैसे जीवन के सारे रंग दूसरों की दीवारों पर चिपक गए हों, और उसका घर धूल से ढका कोई पुराना चित्र बन गया हो।
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एक दिन रीमा ने पास के स्कूल में ट्यूशन पढ़ाने का काम शुरू किया। कुछ पैसों की आमदनी हुई तो घर में थोड़ा सुकून लौटा। उसी ने अपने पिता से कहा —
“बाबूजी, जीवन तब तक बेरंग नहीं होता जब तक हम खुद रंग भरना बंद न करें।”
उसकी बात गोविंद के दिल में उतर गई। उसने अपनी पुरानी आदत — बच्चों को पढ़ाना — फिर शुरू की। धीरे-धीरे मोहल्ले के बच्चे उसके पास आने लगे। गोविंद का घर फिर से हँसी और रौनक से भर गया।
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समय बीता, और वह “बेरंग” जीवन फिर से रंगीन हो उठा — न पैसों से, न वैभव से, बल्कि समझ, मेहनत और अपनापन के रंगों से।
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