गांव में पहले से ही एक पुजारी पूजा-पाठ करता था, इसलिए भोला पंडित को अपने भरण-पोषण के लिए पास के दूसरे गांवों में जाना पड़ता था। रोज सुबह निकलना, दोपहर तक पूजा करना और शाम तक लौटना — यह क्रम कई वर्षों तक चलता रहा। उम्र ढलने लगी थी, शरीर अब उतना साथ नहीं देता था।
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एक दिन किसी यात्री ने बताया कि पास के रतनपुर गांव में मंदिर के लिए एक पंडित की आवश्यकता है, साथ ही गांव की ओर से रहने के लिए एक मकान भी दिया जाएगा। यह सुनकर भोला पंडित के मन में आशा जगी —
“अब तो यही ठीक रहेगा। अकेला जीवन है, इस झोंपड़ी में सड़ती छत से तो अच्छा है कि कहीं स्थायी ठिकाना मिल जाए।”
अगले ही दिन उन्होंने अपने झोले, ग्रंथ और बिस्तर समेटे, और चल दिए रतनपुर की ओर।
गांव पहुंचने पर सरपंच, पटेल और कुछ भले लोगों ने उनका स्वागत किया। बातचीत हुई, पूजा-पाठ की जिम्मेदारी तय हुई और रहने के लिए एक पुराना मकान दे दिया गया। मकान मंदिर के ठीक सामने नहीं, बल्कि गांव के कोने में एक सुनसान रास्ते पर था।
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पहली रात सब ठीक लगा — हवा की सरसराहट, दीवारों पर पुराने दीये की लौ, और भगवान के नाम का जप।
पर दूसरी रात कुछ अजीब हुआ।
मध्यरात्रि को किसी के गाने की आवाज आई — धीमी, दर्द भरी पर मोहक।
भोला पंडित चौकन्ने हो उठे।
खिड़की से झांका तो देखा, सामने वाले मकान में लाल परदे के पीछे दीपक जल रहा था, और कुछ परछाइयां झूम रही थीं।
सुबह गांव में पूछा तो सब चुप हो गए।
फिर एक बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा —
“पंडित जी, उस घर की बात मत कीजिए... वह घर रेशमा का है। कभी वो इस गांव की इज्जत थी, अब लोग उसकी ओर देखना भी नहीं चाहते। वेश्यावृत्ति का धंधा करती है वो और उसकी औरतें...।”
भोला पंडित सन्न रह गए।
उन्होंने सोचा कि भगवान ने उन्हें इस मकान में क्यों लाया, शायद किसी कारण से।
अगली रात फिर वही आवाज आई —
“पंडित जी... भगवान के नाम पर जरा गंगाजल दे जाइए... यहां कोई पूजा नहीं होती।”
पंडित जी डरते-डरते दरवाजे तक गए। सामने वही रेशमा थी, चेहरे पर गहरा दर्द और आंखों में लज्जा।
उसने कहा — “पंडित जी, हम भी कभी किसी की बेटी थीं, अब बस लोग हमें नाम से नहीं, काम से पहचानते हैं। एक बार मेरे घर में भगवान का नाम फिर से गूंजे, यही चाहती हूं।”
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भोला पंडित कुछ क्षण मौन रहे, फिर बोले —
“पाप स्थान नहीं करता, मन करता है। अगर मन शुद्ध है तो हर घर मंदिर बन सकता है।”
अगले दिन से उन्होंने उस घर में भी दीप जलाया।
गांव वाले पहले विरोध करने लगे — “पंडित जी, ये तो अपवित्र जगह है।”
पर पंडित जी ने शांत स्वर में कहा — “भगवान के लिए कोई अपवित्र नहीं होता।”
धीरे-धीरे रेशमा और उसकी औरतों ने वह धंधा छोड़ दिया।
मकान से गाने की जगह अब भजन की आवाज आने लगी।
गांव वालों की नजरें भी बदल गईं — पहले जो तिरस्कार था, अब दया और सम्मान में बदल गया।
भोला पंडित के जीवन का असली मकसद अब पूरा हुआ —
उन्होंने किसी मंदिर को नहीं, बल्कि कुछ खोए हुए जीवनों को पवित्र कर दिया।
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