मनुष्य अपने जीवन में हर किसी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करता। यहाँ तक कि जिन लोगों से वह रोज़ मिलता-जुलता है, उन पर भी नहीं। उसके मन में हमेशा यह डर बना रहता है कि न जाने कब, कहाँ या किस परिस्थिति में कोई व्यक्ति ऐसा अनुचित कार्य कर दे, जिससे बाद में उसे पछताना पड़े।
परंतु यह भी एक अटल सत्य है कि जो व्यक्ति आँखें मूँदकर किसी दूसरे पर विश्वास करता है, वह वास्तव में अपने समान दूसरे को भी ईमानदार और सच्चा मानता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सामने वाला व्यक्ति उस विश्वास पर खरा उतरेगा ही — यह तो केवल समय ही बता सकता है।
Ad
जो व्यक्ति किसी के विश्वास पर खरा उतरता है, वह समाज में वह स्थान प्राप्त करता है जहाँ हर कोई नहीं पहुँच पाता। वहीं, अधिकतर लोग स्वार्थी प्रवृत्ति के होते हैं। वे इस अवसर की प्रतीक्षा में रहते हैं कि कब कोई उन पर विश्वास करे, ताकि वे अपने स्वार्थपूर्ण कार्यों को पूरा कर सकें।
लेकिन ऐसे लोग यह नहीं समझते कि जिसने उन पर विश्वास किया है, वह केवल भरोसा नहीं कर रहा — वह उनकी परीक्षा भी ले रहा है कि वे वास्तव में कितने योग्य और ईमानदार हैं।
स्वार्थ व्यक्ति को लोभी बनाता है, जबकि परस्वार्थ (निःस्वार्थता) उसे परोपकारी बनने का मार्ग दिखाता है। परंतु इस मार्ग पर चलना आसान नहीं होता, क्योंकि इसके लिए व्यक्ति को अपना समय देना पड़ता है और अपने लाभ की भावना से ऊपर उठना पड़ता है। यही कारण है कि हर व्यक्ति इस मार्ग को अपनाने का साहस नहीं कर पाता।
Ad
स्वार्थ और परस्वार्थ – ये दोनों जीवन के दो पहलू हैं। जब तक जीवन है, ये दोनों एक साथ चलते रहेंगे।
''मेरे विचार''
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
rameshbabu7568@gmail.com