दिल्ली शहर की भीड़ में, आरव और काव्या की मुलाक़ात एक सड़क दुर्घटना के दौरान हुई। काव्या एक घायल बच्चे को अस्पताल पहुँचाने की कोशिश कर रही थी, वहीं आरव वहाँ पहले से मौजूद एम्बुलेंस की व्यवस्था कर रहा था। दोनों की नज़रें मिलीं — और जैसे समय ठहर गया।
आरव को काव्या की निडरता पसंद आई, और काव्या को आरव की संवेदनशीलता।
दोनों ने एक-दूसरे के कॉन्टैक्ट लिए, और धीरे-धीरे दोस्ती के रंग रिश्ते में बदलने लगे।
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काव्या का जीवन तेज़ रफ्तार में था — सोशल मीडिया, ब्रांड्स, इवेंट्स और समाज सेवा।
वहीं आरव सादगी में विश्वास रखने वाला था — सुबह की चाय, दादी माँ के संग बातें और काम में ईमानदारी।
दोनों अलग थे, पर एक-दूसरे के बिना अधूरे।
आरव कहता था — “काव्या, तुम मेरी दुनिया को रंग देती हो।”
काव्या मुस्कुराती — “और तुम मेरे दिल को सुकून देते हो।”
लेकिन हर कहानी में एक मोड़ आता है।
काव्या के करियर के लिए उसे विदेश जाना पड़ा।
आरव उसे रोकना नहीं चाहता था, लेकिन दिल से टूट गया।
दादी माँ ने कहा — “बेटा, सच्चा प्यार वही होता है जो उड़ने की आज़ादी दे, बाँधने की नहीं।”
काव्या विदेश चली गई, लेकिन दिल में आरव था।
वो हर सफलता के बाद, हर फोटोशूट के बाद, आरव का नाम अपने दिल में दोहराती — “दो दिल, एक जान।”
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छह महीने बाद, एक बरसाती शाम को जब आरव ऑफिस से लौटा, तो दादी माँ ने दरवाज़ा खोला —
और दरवाज़े पर काव्या खड़ी थी, भीगी हुई, पर मुस्कुराती हुई।
उसने कहा — “आरव, मैंने बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ पाया, पर तुम्हारे बिना सब अधूरा था। मुझे अपनी ‘नई ज़िंदगी’ तुम्हारे साथ पूरी करनी है।”
आरव ने बिना कुछ कहे उसका हाथ थाम लिया।
बारिश की बूंदें उन पर गिर रही थीं, और पीछे से दादी माँ ने धीमे स्वर में कहा —
“अब समझ आया, क्यों लोग कहते हैं... दो दिल, एक जान।”
--- लेखक - रमेशबाबू
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