जब मनुष्य को यह पता चल जाए कि उसकी मृत्यु कब, क्यों और कैसे होगी, तब उसका जीवन पूरी तरह बदल जाता है। यह ज्ञान उसके सोचने, समझने और जीने के तरीके को गहराई से प्रभावित करता है।
सबसे पहले, मनुष्य के मन में भय और बेचैनी उत्पन्न होती है। मृत्यु का निश्चित समय और कारण जानकर वह हर क्षण उसी की कल्पना में जीने लगता है। उसकी आशाएं, सपने और योजनाएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती हैं, क्योंकि उसे लगता है कि अब सब कुछ समाप्त होने वाला है।A
कुछ लोग ऐसे ज्ञान से आध्यात्मिक रूप से जागरूक हो जाते हैं। वे अपने बचे हुए समय को सार्थक कार्यों में लगाने का निश्चय करते हैं — दूसरों की सेवा, भलाई या आत्मचिंतन में। वे मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत मानते हैं।
वहीं, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो भय और निराशा के अधीन होकर जीवन से दूर भागने लगते हैं। वे खुशियाँ महसूस नहीं कर पाते, और हर सुख-दुख में उन्हें मृत्यु की छाया दिखाई देती है।A
संक्षेप में कहा जाए तो —
अगर मनुष्य को अपनी मृत्यु का समय, कारण और तरीका पहले से पता हो जाए, तो वह या तो अति विवेकशील और आत्मज्ञानी बन सकता है, या फिर भय और उदासी में डूब सकता है।
यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह उस सत्य को स्वीकार करता है या उससे भागता है।
'' मेरे विचार''
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