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रविवार, 5 अक्टूबर 2025

जिंदगी और रिश्तो का सच - जीवनी



🌿 ज़िंदगी और रिश्तों का सच 🌿

भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में कब रिश्ते अपने हाथों से फिसल जाएँ या अपने से दूर चले जाएँ, यह किसी को पता नहीं चलता।
हम सुबह से शाम तक भागते रहते हैं — सपनों के पीछे, काम के पीछे, मंज़िलों के पीछे —
पर इसी दौड़ में कहीं न कहीं अपने ही पीछे छूट जाते हैं।
वो अपने — जो हमारे सुख-दुख के साथी थे,
जो बिना कहे हमारी हर बात समझ लेते थे,
वो रिश्ते जो कभी दिल के सबसे करीब थे,
आज बस मोबाइल की गैलरी की तस्वीरों या पुराने मैसेजों में रह गए हैं।

ज़िंदगी इतनी तेज़ हो गई है कि हम रुककर एक मुस्कान बाँटने का भी वक़्त नहीं निकाल पाते।
हर कोई बस “टाइम नहीं है” कहकर आगे बढ़ जाता है —
पर कोई यह नहीं सोचता कि वक्त तो कभी किसी के पास नहीं होता,
वक्त को तो हमें अपने अपनों के लिए बनाना पड़ता है।

रिश्ते फूलों की तरह होते हैं,
अगर रोज़ थोड़ा-सा स्नेह, थोड़ा-सा ध्यान, थोड़ा-सा समय न मिले,
तो उनकी महक धीरे-धीरे कम हो जाती है।
और जब एहसास होता है कि वो लोग दूर चले गए हैं,
तो बस पछतावा रह जाता है कि काश,
थोड़ा वक़्त पहले दे दिया होता…
थोड़ा प्यार पहले जता दिया होता…

इसलिए जब तक अपने साथ हैं,
उन्हें महसूस कराइए कि वे आपके लिए कितने अहम हैं।
माँ-बाप से बातें कीजिए, दोस्तों से मिलिए,
किसी का हाल पूछ लीजिए बिना किसी स्वार्थ के।
क्योंकि जो पल आज है, वही असली तोहफ़ा है —
कल का भरोसा किसी के पास नहीं।

ज़िंदगी का असली सुकून रफ़्तार में नहीं,
बल्कि रिश्तों की गर्माहट में है।
जो लोग आपके साथ हर हाल में खड़े हैं,
उनके लिए एक “धन्यवाद” या एक “मुस्कान” भी बहुत मायने रखती है।
मत भूलिए —
कभी-कभी छोटी-सी बातचीत भी एक टूटे रिश्ते को फिर से जोड़ सकती है।

क्योंकि आखिर में,
ना शोहरत साथ जाती है, ना दौलत,
सिर्फ़ यादें और रिश्ते रह जाते हैं —
जो ज़िंदगी को मायने देते हैं।


लेखक - रमेशबाबू

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