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गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

"एक सोच ऐसी भी"-

मनुष्य हर कार्यक्षेत्र में यह सोचकर चलता है कि उसका कार्य किसी दूसरे के अहित का कारण न बने। वह मेहनत, लगन और निष्ठा के साथ आगे बढ़ने की कोशिश करता है ताकि समाज में अपनी एक पहचान बना सके। किंतु कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो स्वयं के विकास से अधिक दूसरों की प्रगति से जलते हैं। उन्हें यह भय सताता रहता है कि कहीं कोई उनसे आगे न निकल जाए, कहीं उनकी प्रतिष्ठा, सम्मान या महत्व कम न हो जाए।

ऐसे लोगों के मन में यह विचार घर कर लेता है कि यदि दूसरा व्यक्ति सफल हो गया तो उनका अस्तित्व गौण हो जाएगा। इसी सोच के कारण वे अपने मन में घृणा, ईर्ष्या और द्वेष के बीज बो लेते हैं।
कहते हैं — “मनुष्य स्वयं के दुख से उतना दुखी नहीं होता, जितना दूसरे के सुख से।”
यह कथन आज के समय में पूरी तरह सत्य प्रतीत होता है।
दूसरे की सफलता को देखकर उनका मन विचलित हो उठता है। वे यह सोचने लगते हैं कि किसी भी प्रकार से उस व्यक्ति को नीचे गिरा दिया जाए, उसके कार्य में बाधा डाली जाए या उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाई जाए। इस प्रकार वे स्वयं चालाकी और धोखाधड़ी के जाल बुनने लगते हैं। दिन-रात यही सोचते रहते हैं कि कब दूसरा व्यक्ति किसी मुसीबत में फंसे और मैं चैन की नींद सो सकूं।
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पर क्या सच में ऐसा संभव है?
क्या कोई व्यक्ति दूसरे की नींद उड़ा कर स्वयं सुख की नींद सो सकता है?
नहीं! क्योंकि जो मन ईर्ष्या से भरा हो, जो दूसरों की हानि में अपनी खुशी ढूंढे, उसे सच्ची शांति कभी नहीं मिल सकती।
ऐसे लोग बाहर से चाहे जितना मुस्कुराएं, भीतर से हमेशा जलन, असुरक्षा और बेचैनी में जलते रहते हैं।
लेखक का यह विचार यथार्थ है कि हर व्यक्ति अपने जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परिश्रम करता है, ताकि उसका परिवार और भविष्य सुरक्षित रहे। वह अपने कार्य को निष्ठा से पूरा कर, सफलता की ओर बढ़ना चाहता है। किंतु इस समाज में ऐसे भी लोग हैं जो दूसरों के सुख, प्रगति और सफलता को देखकर चैन नहीं ले पाते।

मनुष्य की यह आदत — “दूसरे की नींद चुराने” की — उसके पतन का कारण बनती है।
क्योंकि जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह स्वयं उसी में गिरता है।
ईर्ष्या और द्वेष की आग में जलता हुआ व्यक्ति न तो स्वयं आगे बढ़ पाता है, न किसी और को बढ़ने देता है।

अतः हमें यह सीखना चाहिए कि सफलता की सच्ची राह केवल परिश्रम, सत्य और सद्भाव से होकर गुजरती है।
दूसरे की प्रगति में अपनी हार नहीं, बल्कि प्रेरणा देखनी चाहिए।
क्योंकि जो व्यक्ति दूसरों की सफलता पर खुश होता है, वही सच्चे अर्थों में जीवन का आनंद ले सकता है।

“दूसरों की नींद चुराने वाले कभी शांति नहीं पा सकते,
जो दूसरों के सुख में सुखी रहते हैं — वही सच्चे मनुष्य हैं।”
 
"मेरे विचार"

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