इच्छाएँ ही मनुष्य को कर्म करने, आगे बढ़ने और सफलता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती हैं, किंतु जब ये इच्छाएँ असीम और अनियंत्रित हो जाती हैं, तब वही इच्छाएँ दुख, असंतोष और तनाव का कारण बन जाती हैं। लालच, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा इसी असंतुष्ट मन की उपज हैं।q..
यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीख ले, आवश्यक और अनावश्यक इच्छाओं के बीच भेद कर सके, तो उसका जीवन कहीं अधिक शांत, संतुलित और सुखमय हो सकता है। सच्चा सुख वस्तुओं की अधिकता में नहीं, बल्कि संतोष में है।q..
इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी सीमाओं को समझे, जो प्राप्त है उसमें आनंद ढूँढे और अपने कर्म को ही सर्वोच्च मानकर जीवन जीए — तभी वह वास्तविक शांति और आनंद का अनुभव कर सकेगा।
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