पुराने शहर के बीचोंबीच एक बड़ा सा मकान था — दीवारों पर वक्त के निशान, छत से झरते पुराने रंग, और दरवाज़े जिन पर ज़िंदगी की आहटें दस्तक देती थीं। उस मकान में “गोविंद” नाम का एक बूढ़ा व्यक्ति अकेला रहता था। उसका जीवन अब उस मकान के लम्बे गलियारे की तरह हो गया था — जहाँ कभी बच्चों की हँसी गूंजती थी, अब सन्नाटा पसरा था।
हर सुबह गोविंद धीरे-धीरे उसी गलियारे में टहलता। दीवारों पर टंगी तस्वीरों को देखता — बचपन की, युवावस्था की, पत्नी की मुस्कान, बेटे की स्कूल की ड्रेस में खींची तस्वीर। हर तस्वीर जैसे उसके जीवन के एक मोड़ की कहानी कहती थी।
वह अक्सर बुदबुदाता — “जीवन भी तो एक गलियारा है... जहाँ एक छोर से जन्म लेकर दूसरे छोर पर मृत्यु की ओर बढ़ते जाते हैं।”
एक दिन उस मकान में एक नया किराएदार आया — आरव, एक युवा लेखक। आरव अक्सर गोविंद से बातें करता, उनकी कहानियाँ सुनता। उसे बूढ़े की बातें गहराई से छू जातीं।
गोविंद ने उसे बताया —
“बेटा, इस गलियारे में कदम रखते हुए लोग आते-जाते रहते हैं। कुछ रिश्ते बीच में रुकते हैं, कुछ आगे निकल जाते हैं। लेकिन अंत में हर कोई अपने कमरे की चौखट तक पहुँच जाता है, जहाँ सिर्फ़ सन्नाटा और यादें होती हैं।”
आरव ने पूछा — “तो क्या गलियारा दुख का प्रतीक है?”
गोविंद मुस्कुराया — “नहीं बेटा, यह जीवन का रास्ता है। इसमें उजाले भी हैं, अंधेरे भी। फर्क सिर्फ़ इतना है कि हम किस ओर देखते हैं — दीवारों के निशान पर या खिड़की से आती रोशनी पर।”
दिन बीतते गए। एक सुबह आरव ने देखा — गोविंद का दरवाज़ा आधा खुला था, कुर्सी पर उनकी चश्मा रखी थी, और गलियारे के दूसरे छोर पर रोशनी फैली हुई थी।
गोविंद अब उस गलियारे से गुजर चुका था — जहाँ से लौटकर कोई नहीं आता।
लेखक - रमेशबाबू
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