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Life Thinking

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शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

कहानी-देख सत्य,सोच का नजरिया असत्य आधारित

कहानी विशेष = मनुष्य की आंखें जो देखती है। वहीं सत्य रहता है। जिसे ही मनुष्य को मानना और समझना पड़ता है। किंतु कभी-कभी हम जो देखते हैं। बह जो सत्य होता है। लेकिन उसको समझने का नजरिया कुछ अलग ही होता है। और दिमाग मान लेता है। उसे आंखों का धोखा कहते हैं।
जैसे- आईये? अब कहानी के माध्यम से समझते है।

शशिपुर
गांव में भोलाराम नाम का एक पंडित अकेला रहता था।
गांव में कोई दूसरा पुजारी पूजा करता था। इसलिए अपने भरण पोषण के लिए बह पास ही के गांव में पूजा करने जाता था। किंतु दूसरे गांव दूर होने के कारण आने-जाने में बहुत समय लगता था। फिर उसने सुना कि किसी गांव में पंडित जी की जरूरत है। तथा रहने के लिए मकान भी दिया जाएगा। फिर उसने सोचा कि ऐसे भी अपने आगे पीछे कोई नहीं है। तथा इस घास-फूस की झोपड़ी से तो अच्छा ही मकान मिलेगा। साथ ही आने-जाने की बीमारी भी खत्म हो जाएगी। फिर पंडित जी अपने झोंले बिस्तर बांध चल दिए। दूसरे गांव में पहुंचने पर सरपंच, पटेल, गांव वालों से बात करने पर मंदिर की पूजा करने के लिए हा भर दी गई। साथ सभी गांव वालों से पूजा करने के बाद भिक्षा भी ली जाए। और रहने का प्रबंध भी गांव के पास किया गया। लेकिन प्रिय पाठको मैं बताना चाहता हूं। कि जहां पंडित जी को रहने के लिए मकान दिया गया। उसके आगे वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं के मकान तथा उसके आगे राशन की दुकान थी। तथा मकान लंबी कतार में जगह - जगह बसे हुए थे। पंडित जी के मकान से अंतिम छोर में मंदिर था। यानी अगर मंदिर से पंडित जी के मकान की तरफ जाए तो अंतिम छोर में पंडित जी का मकान था। इसलिए पंडित जी पूजा करने के लिए सर्वप्रथम मंदिर में जाकर उधर से भिक्षा मांग कर राशन की दुकान से खाने पीने का सामान लेकर। वेश्याओं से भिक्षा मांग कर अपने मकान में पहुंचते थे। ताकि बचे हुए अनाज को खाने के रूप में प्रयोग कर सके। दो-चार दिन तो यह लगातार क्रिया जारी रही पंडित जी।A पूजा करना भिक्षा मांगना और दुकान से राशन लेकर वेश्याओं के घर से अनाज लेकर अपने मकान पर जाना। धीरे-धीरे यह बात गांव में आग की तरह फैल गई। की पंडित जी भिक्षा लेकर भिक्षा में आए हुए अनाज दुकान पर बेचकर। पैसे लेकर वेश्याओं के घर जाता है। जबकि इस बात का पता पंडित जी को भी नहीं था। कि घर के पास में ही वेश्याओं के घर है ने ही गांव वालों ने इस बात के बारे में बताया। उन्होंने तो पूरे गांव में भिक्षा मांगने को कहा था। पंडित जी की  अब खैर नहीं थी। पंडित जी को बुलाया गया। जबकि पंडित जी बीच-बीच में कुछ कहना चाह रहे थे लेकिन गांव वालों ने पंडित जी की कुछ बात नहीं सुनी। और उन्हें अच्छी बुरी बातें सुन कर गांव से बाहर निकाल दिया।

निष्कर्ष-

समाप्त


            लेखक - रमेश बाबू लोधा

रविवार, 29 जून 2025

कलयुग जीवन की महान गाथा .....और जीवन बीत गया

में अनार्थ आश्रम में चारपाई बेठा था। पास ही मेरे बुढ़ापे का साथी डंडा था। मैं अपने जीवन के बीते हुए दिनों के बारे में कुछ सोच रहा था। हालांकि मेरा जीवन शुरू से ही संघर्ष भरा रहा है। मैं अपने माता-पिता का अकेली संतान था। बचपन में पिताजी गुज़र जाने के कारण मां के कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। आर्थिक परिस्थितियों भी बहुत कमजोर थी। जैसे तैसे गुजारा कर मां ने मुझे पढ़ाया लिखाया उच्च माध्यमिक में पढ़ाई जारी हुई थी। कि मेरी मां की भी मृत्यु हो गई। अब मैं अकेला बचा था। हालांकि मेरे ताऊ, चाचा थे। किंतु कोई किसी का साथ नहीं देता है। सभी अपने परिवार और कार्य में मस्त थे। लेकिन कहते हैं ना की- गरीबी बुरा वक्त किसी से नहीं मिलता है। साथ फिर भी रहती है। केवल एक ही आश परमात्मा!
लेकिन फिर भी मैंने हौसला नहीं छोडा़ पढ़ाई और घर का काम जारी रखा।
धीरे-धीरे मैंने B.A पास कर ली। लेकिन अभी तक नौकरी का कोई चांस नहीं था। आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए रुपए पैसों की जरूरत थी। जो मेरे पास पर्याप्त नहीं थे। इसलिए मैंने सोचा कि क्यों ने छोटा-मोटा काम धंधा या किसी के यहां काम कर आगे की पढ़ाई जारी रखी जाए। ''मरता क्या नहीं करता''Aaa
गांव से शहर की तरफ चल दिया। काम की तलाश करते हुए एक कपड़े की दुकान पर काम मिल गया। दिन में कपड़े की दुकान पर ग्राहकों को कपड़े दिखाना पैक करना। ग्राहकों को देना था। और रात को पढ़ाई जारी रखना था। धीरे-धीरे मैंने b.Ed की परीक्षा पूरी कर ली। वह भी अच्छे अंकों के साथ। वैकेंसी निकली और थर्ड ग्रेड टीचर भर्ती की परीक्षा दी। फिर अपने कार्य में लग गया। कुछ दिनों में रिजल्ट जारी होने वाले थे। मेरे मन में यह विश्वास नहीं था। कि मेरा भी सिलेक्शन हो सकता। किंतु मनुष्य पूरी लगन मेहनत और विश्वास के साथ कोई किया गया कार्य असफल नहीं हो सकता। और मेरा सिलेक्शन थर्ड ग्रेड टीचर के रूप में गांव के ही पास वाले गांव मे ड्यूटी लग गई । अब जरूरत थी। केवल गृह संगिनी की कहते हैं कि एक दूसरे का सुख - दुख: बांटने वाला कोई ना कोई होना चाहिए ।लेकिन व्यक्ति के पास नौकरी आने से पैसा और पैसा आने पर मेल- मिलाप करने वाले व्यक्तियों की भी कमी नहीं होती। एक नहीं चार-चार रिश्ते घर बैठे आ रहे थे। देहज में कोई क्या दे रहा था। तो कोई क्या दे रहा था।
लेकिन मैं दहेज का लोभी ने होकर पारिवारिक, सुशील और संस्कारी गृह संगिनी चाहता था। जिस गांव में मैं पढाने जाता था। उसी गांव की राधा नाम की लड़की से मैंनें शादी कर ली जो एक गरीब किसान की लड़की थी। जो गुण में चाहता था। वह उसमें कूट-कूट के भरे हुए थे।
राधा घर का काम मैं पढ़ाने जाता था। जीवन बहुत आनंद से गुजर रहा था। धीरे-धीरे शादी को 3 साल बीत चुके थे।डॉक्टर को भी दिखाया,मंदिर पूजा,झाडा- फूकीं, दान - दक्षिणा आदि सभी मन्नते करने के बाद
अभी तक घर में बच्चें की किलकारियों की आवाज नहीं गूंजी थी। गांव की औरतें कई तरह की बातें बनाती। जिससे राधा का मन बहुत दुखी होता था।
और वह मुझसे कहने लगती थी।क्या मेरे कभी बच्चे होगे या नहीं होगे या मैं इसी तरह की बातें जीवन भर सुनती रहूंगी। मैंने आश्वासन देते हुए कहा कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन बहुत दिनों बाद भगवान ने हमारी सुन ली। राधा ने अपने एक बच्चे को जन्म दिया। खुशी से पूरी बस्ती को भोजन कराया पंडे - पुजारी को दान-दक्षिणा  आदि। राहुल को पढ़ने लिखने में किसी चीज की कमी नहीं आने दी। बड़ा होने पर डिप्लोमा डिग्रियों के नाम से खूब पैसा खर्च किया । लेकिन अभी तक सरकारी/ प्राइवेट किसी भी तरह की नौकरी नहीं लगी थी। मैंने सोचा क्यों नहीं अच्छी लड़की देख कर इसकी शादी कर दी जाए। कुछ दिनों में भी शिक्षक की नौकरी से रिटायरमेंट होने वाला हूं। राहुल से बात भी की लेकिन उसने बताया। कि मैं अपने कॉलेज में पढ़ने वाली नेहा मेरी फ्रेंड है। उससे शादी करना चाहता हूं। राधा ने बहुत समझाया कि बेटा किसी गांव की लड़की शादी कर लो। लेकिन उसने एक ने मानी मुझे मजबूर होकर शहरी लड़की से शादी करनी पड़ी। पहले तो बहू में किसी तरह की कमी नजर नहीं आई। समय पर चाय, नाश्ता, खाना टाइम पर देती थी। शायद मेरी बहू के बारे मे सोच गलत थी। सब कुछ अच्छे से चल रहा था। राधा जो राहुल की मां बीमार रहने लगी। डॉक्टर से दिखाने पर पता चला कि। उसको लिवर कैंसर है। बीमारी में पड़े रहने पर उसकी बहू राधा को खरी - कोठी सुनाती रहती थी। कि- कितना पैसा बर्बाद कर दिया। बहुत इलाज करवाने के बाद भी ठीक नहीं हो पाई और एक दिन भगवान को प्यारी हो गई। मेरा जो रिटायरमेंट का पैसा मिला था। उनको राहुल आज यह काम है, कल वह काम है। के नाम पर पूरे पैसे मेरे अकाउंट से निकल चुका था। मेरा शरीर अब इतना काम नहीं देता था । जितना कि पहले राहुल को भी अभी तक किसी तरह की नौकरी नहीं मिली थी। बहु जो सुबह शाम राहुल से लड - लड़कर घर को सिर पर उठा लेती थी। दिन रात की चक - चक से मेरा मन बहुत उदास रहने लगा। एक दिन मैं खाने के लिए जैसे ही घर जा रहा था। मैंने सुना की राहुल नेहा से कह रहा था। कि सभी लड़ाइयां का कारण मेरा पिता है क्यों न उन्हें अनार्थ आश्रम में छोड़ आए। मेरा मन अंदर ही अंदर फबक-फबक कर रो पड़ा। शायद राधा मेरी पत्नी अभी जिंदा होती तो। हम किसी तरह दोनों पति-पत्नी अपना जीवन अलग से ही व्यतीत कर लेते। यह लड़ाई झगड़ा मेरे ही कारण होते हैं। मां बाप अपने बच्चों को कितनी मुसीबत से पाल- पोसकर बड़ा करते हैं। जो कुछ कमाते अपने बच्चों के लिए कमाते हैं। लेकिन बच्चों को केवल मां-बाप का साथ बुढ़ापे में ही देना होता है। अगर अनार्थ आश्रम में बुढ़ापा गुजरना होता तो। मां-बाप अपने बच्चों जन्म देकर पाल-पोसकर बड़ा क्यों करते, क्यों इतने कष्ट उठाते। तभी से में बिना कुछ कहे अनार्थ आश्रम मे आ गया। 12 महीने गुजर चुके हैं। अभी तक राहुल ने मेरी खोज-खबर भी नहीं ली। शायद मेरे आने से लड़ाई- झगड़े तो बंद हुए। खयालों में खोया हुआ था।कि तभी पीछे से आवाज आई रामदीन- रामदीन पीछे मुड़कर देखा तो संजय शुक्ला जो मेरा परम मित्र था। अनार्थ आश्रम में दोनों साथ-साथ रहते हैं। एक दूसरे से सुख दुख की बात करते रहते हैं। संजय शुक्ला बोला- मैं कब से अंदर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। चलो चलकर शाम का खाना खा लेते हैं। मैं भी बोल पड़ा चलो चलते हैं।Aaa


समाप्त


              लेखक - रमेश बाबू


शनिवार, 28 जून 2025

मतलबी दुनिया - कहानी (नारी विशेष)

इस कहानी और पात्र में किसी भी नारी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है। अपितु अपने ऊपर हो रहे हैं। अमानवीय व्यवहार( बाल विवाह, देहज, कुप्रथा ,) का विरोध वे स्वयं सही निर्णय लेने का अधिकार इसके लिए स्वयं को आगे आना होगा है। क्योंकि- सोच के सोचो वही नारी- मां, बहन ,बेटी के रूप में!  पुरुषों की भी जिम्मेदारी है ।अगर नारी नहीं रहेगी तो पुरुषों का भी अस्तित्व भी गायब हो जाएगा।
"कामयाबी की बुलंदियों में हम यूं ही बढ़ते जाएंगे।
कभी मदर टेरेसा तो कभी झांसी का रूप दिखायेगे।

पाठ विशेष =बाल्यावस्था में की गई शादी से बच्चे शारीरिक व मानसिक रूप से परिपक्व नहीं हो पाते।
अच्छे और बुरे के बारे में सोच नहीं पाते हे।
भारत में आंकड़ों(W.H.O) के आधार पर हर 5 मिनट में एक मां की मृत्यु हो जाती!A


बरसात का मौसम था। छोटी- छोटी फुहारे आसमान से
जमीन पर गिर रही थी ! अकाशीय बिजली चमक रही थी।  करीब- करीब शाम के 8:00 बज चुके थे!

श्याम खाना खाकर सोने वाला था। कि पड़ोस के घर से आवाज आई चारपाई पर लेटा कर ले चलो । श्याम सोचा आखिर क्या हुआ। टॉर्च बे छाता लेकर निकले पड़ा।

चार पांच व्यक्ति पहले से बहा खड़े हुए थे। उन्होंने बताया कि कल्लू काका की बहु मंगू की बीवी पेट से( प्रेग्नेंट ) हे। मंगू की शादी पास के दूसरे गांव के हरिया की लड़की बुलबुल से हुई थी।

बह पढने मे बहुत ही होनहार लड़की थी। गरीबी के चलते तथा गांव की गलत अवधारणाओं के कारण 14 वर्ष की उम्र में ही शादी कर दी गई थी। मंगू भी स्कूल जाता था।
अभी शादी को 1 साल हुए थे कि । अब बह मां बनने वाली थी।

प्रिय, पाठको- मैं यहां बताना चाहता हूं ।कि गांव से सड़क तक पहुंचने के लिए कच्चा पगडंडी रास्ता जो सड़क तक पहुंचने में 3 किलोमीटर दूर पड़ता था। जहां पैदल पहुंचने में 45 मिनट का टाइम लगता था । श्याम के गांव से होकर दूसरे गांव की जमीन  से होकर गुजर पढ़ता था । उन लोगों की जमीन से होकर गुजरने पर मरने मारने पर उतारु होते थे।
नहीं चाहते थे। कि हमारी जमीन में से होकर रास्ता निकले। विधायक द्वारा विधायक कोष से भी सहायता प्रदान करने की बात कही लेकिन पड़ोस के गांव वालों ने कोर्ट द्वारा स्टे लगवा दी गई।

गांव वालों ने शासन -प्रशासन, अखबार, न्यूज़, से भी गुहार लगाई। राजनेताओं तक भी बात पहुंचाई। लेकिन समस्या का कोई हल नहीं निकला।

अब आगे बताना चाहते हैं कि। गर्भवती महिला को चारपाई पर चार कंधो पर रखकर ! ऊपर त्रिपाल( विशेष तरह की पन्नी बरसात से बचने के लिए )सास और अन्य महिला भी साथ में चल दिए ।

जैसे- तैसे पक्की सड़क तक पहुंचाया गया। अब मुसीबत थी। हॉस्पिटल ले जाने के लिए साधन(वेन) की। एक व्यक्ति जाकर दूसरे गांव से जैसे- तैसे हॉस्पिटल ले जाने वाले साधन की व्यवस्था की गई जिसमें एक घंटा गुजर चुका था।

पक्के रोड से हॉस्पिटल की दूरी अभी 34 किलोमीटर बाकी थी। तथा पक्की सड़क भी जगह -जगह खुदी हुई थी। जिससे गाड़ी से खटखट धक, धक की आवाज सुनाई दे रही थी।
इधर बुलबुल के पेट का दर्द भी बढ़ता ही जा रहा था। ड्राइवर द्वारा गाड़ी सरपट रोड पर चले रही थी। तकरीबन एक घंटा बाद हॉस्पिटल में पहुंच गये। 
प्रसूती कक्ष में भर्ती कराया गया।
अब तक 10:45 PM का टाइम हो चुका था। गांव से हॉस्पिटल पहुंचने में 2 घंटे 45 मिनट बीत चुके थे। सभी ने राहत की सांस ली। आधे घंटे बाद नर्स बाहर निकली। मंगू ने कुछ कहना चाहा।
नर्स- खून बहुत वह चुका है ।हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं।
और वापिस प्रसूति कक्ष की तरफ लौट जाती है।
फिर थोड़ी देर बाद मातम का सैलाब ?

सास बुलबुल की रोती हुई बाहर निकली ।मंगू ने पूछा मां क्या हुआ।
मां- बहू नहीं रही। नर्स बाहर निकली। मंगू ने कहा- सिस्टर -सिस्टर क्या हुआ मेरी बीवी को।

सिस्टर- आई एम सॉरी। डेढ़ घंटा पहले भी अस्पताल तक पहुंच जाते तो मैं कुछ कर पाती। साथ ही कम उम्र में बच्चे की मां बनने से ब्लड का ज्यादा रिसाव हो गया।

और चारों तरफ रोने-  बिलखने का मातम सा छा गया।
बरसात भी बंद हो चुकी थी। काले बादल छट चुके थे। शायद बरसात को भी बुलबुल की जिंदगी रास नहीं आ रही थी । कुछ दिनों बाद मंगू विस्ता उठाकर स्कूल की तरफ जाता हुआ दिखाई दे रहा था। शायद गलती का कुछ एहसास हुआ।


📢  प्रिय पाठको, मेरे द्वारा लिखी गई कहानी पर
अपना सुझाव कमेंट बॉक्स में लिखकर भेजें?
मुझे आप सभी का इंतजार रहेगा। ताकि मेरा हौसला यूहि  बढ़ता रहे ।और मैं अच्छी अच्छी कहानी लिख सकूं।


लेखक - रमेशबाबू लोधा

कहानी - मौत के लिए दुआ( सामाजिक)

भाभी मां की कुछ दिन पहले ही मृत्यु हुई थी जो एक छोटे बच्चे को जन्म देकर ही गुजर चुकी थी। घर की सारी रसोई और लालन-पालन की जिम्मेदारी मेरी  मां पर आ गई थी। मेरी उम्र अभी 15 -16 वर्ष की ही थी। छोटा बच्चा जिसने अभी तक मां का दूध मुंह में नहीं लिया था। अक्सर बीमार रहता था।
 भैया अभी भी टेंशन में रहते थे। पिताजी अपने काम में व्यस्त थे। बीमार बच्चे को ले जाने की जिम्मेदारी मेरी थी। गांव में या गांव का आसपास हॉस्पिटल की सुविधा  नहीं होने के कारण। गांव से दूर शहर की और जाना पड़ता था। 

साथ ही कच्चा रास्ता होने के साथ 2 किलोमीटर चलने पर पक्की सड़क पर लोग पहुंचते थे। कुछ वर्ष बाद जैसे- तैसे बच्चा चलने फिरने लगने लगा। मैंने जीवन में अपनों के लिए अपने गांव की सेवा के लिए कुछ करने की ठान ली।

 मैंने कक्षा आठवीं परीक्षा गांव के पास वाले गांव पूरी करने के बाद । पास वाले शहर में जाकर पढ़ाई करना जरूरी समझा। 12वीं कक्षा पास करने के बाद। जीएनएम (G.N.M)डिप्लोमा एक नर्सिंग कोर्स होता है। तैयारी में लग गया साथ ही पढ़ाई भी जारी रखी। 3 साल कोर्स पूरा करने पर। 

हालांकि मैंने प्रैक्टिकल रूप में सभी बीमारी के लिए कोन सी दवा या टेबलेट दी जाती कौन सी बीमारी में कोनसी ड्रिप चढ़ाई जाती है। पास ही के सिटी हॉस्पिटल में कंपाउंडर के रूप में अस्थाई पर मंथ के हिसाब से रख लिया गया। डॉक्टर साहब द्वारा दिए गए निर्देशों की पालना करना।

 कभी रूम नंबर 6 में तो कभी रूम नंबर7 में अभी। तो कभी नर्ससिग वार्ड में नये रोगियों को संभालना पुरानो का ट्रीटमेंट जारी रखना।
बड़ा सिटी हॉस्पिटल होने के साथ ही यहां हर तरह के मरीज आते थे। कभी बड़ी एक्सीडेंट वाले तो कभी छोटी मोटी बुखार ,खांसी ,वाले।


मेरी रोजना की यही दिनचर्या थी सुबह जल्दी जाना।       और शाम को देर से जाना। 

एक दिन सुबह उठने पर पता चला कि मेरे रूम के नल में कुछ खराबी आने के कारण प्लंबर आने में थोड़ी देरी होने पर अपना खाना टिफिन मे रखकर  हॉस्पिटल की तरफ चल दिया। थोड़ा लेट होने पर मेरे सीनियर डॉक्टर ने डांट लगाते हुए कहा कि वार्ड नंबर 6 में इमरजेंसी पेशेंट को देखने जाना है। मैं तुरंत अपना खाना रेस्ट रूम में रखकर वार्ड की तरफ चल दिया।

बेड पर 26-27 साल का नौजवान लेटा हुआ था।

साथ ही दो लड़कियां जिनकी उम्र 5 से 7 साल और एक छोटा लड़का जिसकी उम्र 4 साल के करीब थी। जो एक औरत की गोद में बैठा था ।पास एक 60 साल का बुजुर्ग खड़ा हुआ था। इससे पता लगता है ।कि उस नौजवान के पिता ,पत्नी और उसके बच्चे हैं।


दाखिला कार्ड देखने पर पता चला कि उसका नाम श्यामू है जिसको मुह की कैंसर है।
उसके पिता से बात करने पर पता चला कि वे 10 वर्ष की उम्र में ही तंबाकू जर्दा गुटखा का सेवन करता रहता था।

श्यामू के पिता- और यह मेरा अकेला बेटा है इसकी मां भी गुजर चुकी है। समझाने पर इसने हमारी एक न मानी देखो ना बेटा मेरे से कहा इसके 2 बच्चिया और एक बच्चा है। और शादी के बाद भी बहू ने बहुत समझाया।
हमारे पास जमीन जायदाद के नाम पर महज 2 बीघा मात्र है ।जो केवल भरण-पोषण योग्य है।
यह स्वयं भी कोई काम नहीं करता था।

मैंने कहा- ठीक है बाबू जी मैं देखता हूं
वे अभी भी दर्द से तड़प रहा था।
श्यामू ने लड़खड़ा थी। आवाज में कहां डॉक्टर साहब मेरे को ठीक कर दो मेरे बीवी बच्चे हे।

मैंने कहा श्यामू अपना मुंह खोलना देखने पर पता चला कि उसकी जीव में तंबाकू से एक बड़ी गांठ
बन चुकी थी ।
जो बोलने पर लड़खड़ा ने की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
जिसे ठीक होना नामुमकिन था।
मेरे पास इसका कोई रास्ता नहीं था सिवाय दर्द और नींद का इंजेक्शन लगाने के अलावा। जिससे उसे थोड़ी राहत मिल सके। थोड़ी देर बाद श्यामू को नींद आ चुकी थी।

मैंने कहा बाबूजी- एक तरफ ले जाकर शाम के पिता को पूरी बात बताएं।
आपने बहुत देर कर दी आने में इसकी जीव में बड़ी गांठ बन चुकी है ।जो एक घातक कैंसर का रूप है। हो सकता है कोई भी डॉक्टर इसको सही कर सकें।

श्यामू के पिता- मैं अपने बेटे को ऐसे मरने नहीं दूंगा इसके लिए भले ही मुझे कुछ करना पड़े।

मैंने कहा- ठीक है बाबू जी आप डॉक्टर साहब से लिखवा कर दवाइयां ले आइए।
शाम को 8:00 बज चुके थे । मेरा ड्यूटी से रूम पर जाना था।
खाना खाकर जैसे ही शाम को बिस्तर पर लेटा- श्यामू की दर्द भरी कहानी मेरी आंखों के सामने घूम रही थी।
की मां बाप अपने बच्चों को किस तरह पालते हैं। कितनी तकलीफ उठाते हैं। हर दर्द सहन करते हैं।स्वयं भूखा रहकर अपने बच्चों को खिलाते उनको बड़ा करते हैं । शादी - ब्याह करते हैं। लेकिन बच्चे ही अपनी मनमानी करने से बाज नहीं आते।
यह सोचते हुए ऐसी झपकी (नींद )लगी। 5:00 बजे का अलार्म की आवाज सुनाई दी।
रोज की तरह टिफिन उठाकर रूम से हॉस्पिटल की तरफ चल दिया।
श्यामू को देखने की मेरी जिज्ञासा हुई।
श्यामू से बात करना अच्छा कुछ तकलीफ कम हुई उसने केवल सिर हिलाकर ही जवाब दिया।
उसके पिताजी बाजार गए थे कुछ दवाइयां लेने।
मैंने उन दो छोटी लड़कियों से पूछा बेटा कुछ खाया आपने।
उन्होंने ना में जवाब दिया। लंच रूम गया और मैंने अपना टिफिन उठा लाया। दोनों लड़कियों का थोड़ा थोड़ा खाना दे दिया। मैंने श्यामू की पत्नी से भी बोला लेकिन उन्होंने सिर हिला मना कर दिया।
इतने में श्यामू के पिता जी भी बाजार से आ गए थे।

मैंने बोला - बाबू जी डॉक्टर साहब ने क्या कहा।
श्यामू के पिता- एक तरफ ले जाकर बेटा डॉक्टर साहब ने जवाब दे दिया है कि इसके कैंसर का रोग गले तक जा पहुंचा है जिससे इसे सांस लेने में भी दिक्कत हो रही।
इसे कोई भी डॉक्टर नहीं बचा सकता।
दवाइयों से ही इसकी सांस चल रही है।

मे आज ही अपने पड़ोसी को अपनी जमीन को गिरवी(सूत पर )रख कर थोड़े पैसे लाया हूं। जिससे की दवाइयां  आ सके। इतने पैसे भी नहीं है कि दूसरे शहर में जाकर श्यामू का इलाज करवा सकूं।
मैंने बोला- बाबूजी खाना खा लीजिए मेरे पास टिफिन रखा है।

श्यामू के पिता- नहीं बेटा बुढ़ापे में ऐसे ही भूख कम लगती है। और जिसका जवान बेटा मौत की गोदी में लेटा हुआ है । उसे भूख और नींद कहां से आएगी।

तभी अचानक मुझे याद आया कि वार्ड नंबर 7 में किसी नये पेशेंट को भर्ती करना।

मैंने कहा -ठीक है बाबू जी मुझे कुछ काम है। कुछ जरूरत पड़े तो कह देना।
यह सिलसिला चलता रहा।
बीच-बीच में देखने चल जाया करता था।
मैं डॉक्टर साहब से किसी विषय में बात कर रहा था। कि  श्यामू के पिता  घबराते हुए आऐ और बोले- डॉक्टर साहब जल्दी चलिऐ श्यामू की तबीयत ज्यादा खराब हो रही है।
मैं और डॉक्टर साहब श्यामू के पिताजी पीछे पीछे चल रहे थे। जैसे ही वार्ड नंबर 6 में पहुंचे। श्यामू दर्द से तड़प रहा था।  कहराते हुई दर्द भरी आवाज में हकलाते हुए ।
धीरे से बोल डॉक्टर साहब अब मुझसे दर्द सहन नहीं होता।
मुझे कोई ऐसा इंजेक्शन लगाओ ताकि मेरी जीवन लीला समाप्त हो जाए।
डॉक्टर साहब बोले- हम जीवन देते हैं ।लेते नहीं
हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की लेकिन दर्द कम होने का नाम नहीं लिया।
और श्यामू तड़प-तड़प कर मौत की तरफ बढ़ता ही गया।
और वह आखरी चीख, श्यामू को सदा के लिए सुला गई।उनके परिवार को जीवन भर रुला कर चली गई।
मातम की आवाज पूरे हॉस्पिटल में फैल गई।

मेरा मन गद-गदा हो उठा। कि शायद श्यामू धूम्रपान (गलत नशे)का प्रयोग न करता था !आज उनका परिवार हंसता खेलता रहता।
शायद -पिताजी और अपनी पत्नी का कहना मानता।

न जाने कितने श्यामू और देखना बाकी है जो दर्द भरी
मौत से मर जाऐगे।

और मैं वार्ड नंबर 7 की तरफ चल दिया ।

पाठ विशेष- तंबाकू युक्त  नशे न श्यामू की जिंदगी बर्बाद कर दी। अपने पीछे पिता ,बीबी और बच्चों को रोता -विलगता छोड़ गया। एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती ।अपितु साथ में पूरे परिवार की।
अतः- नशा व्यक्ति को  आर्थिक, शारीरिक ,मानसिक
हानि तो पहुंचाता है। साथ ही सामाजिक स्तर पर इज्जत भी कम होती है। और कभी-कभी जान से भी हाथ धोना पड़ता है।


लेखक -  रमेशबाबू 



गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

कहानी( पारिवारिक) - अपने ही तो अपने होते हैं

एक गांव में सोहन और मोहन नाम के दो भाई रहते थे।
सोहन बड़ा तथा मोहन छोटा था। छोटी ही उम्र में माता - पिता का देहांत हो चुका था। इसलिए सोहन ने खेती के सारे काम जिम्मेदारी अपने ऊपर तथा तथा मोहन को  स्कूल में बाद में पास ही के सिटी कॉलेज में पढ़ाई जारी रखवाई ताकि आगे जाकर। अपने पैरों पर खड़ा हो जाऐ। पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहन को शहर की एक जानी-मानी प्राइवेट कंपनी में जॉब मिल गई थी। फिर थोड़े दिन बाद एक लड़की से शादी करने के बाद शहर में ही बस गया था। अभी तक तो दोनों भाई के रिश्ते में किसी बात को लेकर अनबन नहीं हुई थी। लेकिन वह कहते हैं। ना कि रुपया - पैसा लोभ- लालच और स्वयं को दूसरे पर विश्वास न होने वाले रिश्ते ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाते। यही सोहन और मोहन के साथ हुआ। सोहन और मोहन का एक पड़ोसी था। जिसका नाम राघव था जो पक्का चुगलखोर एवं लडाऊ बाज किस्म का आदमी था। मोहन कभी-कभी अपने गांव जाता रहता था। जिससे उसने मोहन के भी कान भर दिए थे। की इतनी फसल निकलती है। आपको फसल में से कम भाग देता है। जिससे उसके मन में अपने भाई सोहन के प्रति ईस्या जनक भाव पैदा हो गए। और सोहन के बहुत समझाने पर भी अपनी खेती का आधा भाग जमीन का राघव के कहने पर एक दूसरे पड़ोसी को बैच दिया। जो की बहुत कम दामों में बिक चुकी थी। जिसमें राघव को भी सोहन की जमीन कम दाम पर दिलाने पर दूसरे पड़ोसी द्वारा पैसा मिला था। जब बाद में सोहन को पता चला। लेकिन अब क्या हो सकता है। जब चिड़िया चुग गई खेत।

कहानी विशेष = व्यक्ति अपने जीवन को दूसरे के द्वारा या अपनों के द्वारा अपने लक्ष्य की तो पूर्ति कर लेता है। किंतु फिर भी उसे व्यक्ति पर दोबारा विश्वास नहीं करता । जिससे वे कई तरह की मुसीबत और आर्थिक मुसीबत का सामना करता है


                                 लेखक - रमेशबाबू

कहानी - मतलबी दुनिया

स्वयं पर विश्वास क्यों?

स्वयं पर इतना विश्वास रखो कि तुम जिस कार्य को करने का निश्चय करते हो, उसे पूर्ण करके ही छोड़ो। क्योंकि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति ...

कहानी = मतलबी दुनिया नारी विशेष