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Life Thinking

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मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

🌸 बेटियाँ — खुशबू जीवन की 🌸

🌸 बेटियाँ — खुशबू जीवन की 🌸
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जीवन में फूलों सी खुशबू बनती हैं बेटियाँ,
हर आँगन में रौशनी सी जगती हैं बेटियाँ।

माँ की ममता, पिता का अभिमान हैं बेटियाँ,
घर की हर दीवार का सम्मान हैं बेटियाँ।

रोते दिलों में सुकून भर देती हैं, बेटियाँ
टूटी उम्मीदों को नया सफ़र देती हैं।बेटियाँ

त्याग, प्रेम और अपनापन सिखाती हैं बेटियाँ,
हर रिश्ते को अपनेपन से निभाती हैं बेटियाँ।

कभी बहन बनकर रक्षा का वचन निभाती हैं,
कभी बेटी बनकर घर की शान बढ़ाती हैं।

जब मुस्कुराती हैं तो जैसे सवेरा हो जाए,
उनकी हँसी से हर ग़म धुआँ हो जाए।

ईश्वर ने बनाया है इन्हें दुआओं का रूप,
हर घर में ये लाती हैं नई उम्मीदों का स्वरूप।

जहाँ होती हैं बेटियाँ, वहाँ होता है प्यार,
वहीं बसता है सच्चा स्वर्ग-सा संसार। 🌷

सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

पार्टनर संदेह का कारण क्यों?

जीवन में ज्यादातर कार्य ऐसे होते हैं जो दूसरे के सहयोग द्वारा पूर्ण नहीं किया जा सकते हैं। जिनको पूर्ण करने के लिए एक साझेदार बनाया जाता है।  जीवन भर के लिए या कुछ समय के लिए जिसे पार्टनर या जीवनसाथी दर्जा दिया जाता है। जिस कार्य के लिए चुना जाता है।
उससे संबंधित विभिन्न गतिविधियों की पहले जांच पड़ताल करता है। कि यह इस योग्य है या नहीं। किंतु उसे समय उसमें किसी तरह की खामियां नहीं पाने पर उसे पार्टनर के रूप में चुन लिया जाता है। किंतु यह भी परम सत्य है। कि उस समय किसी तरह के विकार कम ही उत्पन्न होते हैं। लेकिन समय के चलते किस पार्टनर में कौन सा विकार मन में घर कर ले यह किसी को पता नहीं रहता। लेकिन इसमें अहम जो महत्वपूर्ण बात आती बह हे। दीमक रूपी संदेह(भ्रम) कभी एक तो कभी दूसरी तरफ से लगना शुरू हो जाए तो। उसे रिश्ते को खोखला( तोड़कर) कर ही दम लेती है। जिसका कोई इलाज नहीं है। 
N.
फिर भी इसके कहीं कारण हो सकते हैं जो नीचे दिए गऐं।
🔹 1. विश्वास की कमी (Lack of Trust)

अगर रिश्ते की शुरुआत से ही भरोसे की नींव मजबूत नहीं होती, तो छोटी-छोटी बातें भी शक का कारण बन जाती हैं।

उदाहरण:
– पार्टनर फोन छिपाकर रखे।
– बातचीत या व्यवहार में बदलाव आए।
– समय पर जवाब न देना या झूठ बोलना।

🔹 2. पिछले अनुभव (Past Experiences)

अगर पहले किसी रिश्ते में धोखा मिला हो, तो मन में डर बैठ जाता है और वही संदेह अब के रिश्ते में झलकने लगता है।

🔹 3. तीसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप (Influence of Others)

कभी-कभी दोस्त, रिश्तेदार या आसपास के लोग किसी के बारे में गलत बातें कहकर दिमाग में शक पैदा कर देते हैं।


🔹 4. कम संवाद (Lack of Communication)

जब पार्टनर खुलकर बात नहीं करते, अपने मन की बातें नहीं साझा करते — तब मन में सवाल उठने लगते हैं।
🔹 5. अत्यधिक लगाव या अधिकार भावना (Possessiveness)

जब कोई व्यक्ति अपने पार्टनर पर ज़्यादा नियंत्रण रखना चाहता है, तो ज़रा सी दूरी या बदलाव भी उसे धोखे जैसा लगता है।

🔹 6. आत्मविश्वास की कमी (Insecurity)

कुछ लोग खुद को कम आंकते हैं — उन्हें डर रहता है कि उनका साथी किसी और से बेहतर व्यक्ति के साथ चला न जाए।

🔹 7. सोशल मीडिया और तकनीक का असर

मोबाइल, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म ने लोगों के बीच पारदर्शिता घटा दी है। “किससे बात कर रहा है?” या “लास्ट सीन कब था?” जैसे सवाल शक को जन्म देते हैं।

🔹 8. प्यार में अत्यधिक अपेक्षा

जब कोई व्यक्ति अपने पार्टनर से ज़रूरत से ज़्यादा उम्मीद रखता है और वे पूरी नहीं होतीं, तो मन में शंका घर करने लगती है।
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'' मेरे विचार''



     लेखक - रमेशबाबू


शुभ - अशुभ क्यों कब कैसे?

मनुष्य अपने जीवन मे कार्यों की शुरुआत करने से पहले शुभ - अशुभ( दिन, समय) आदि को ध्यान में रखकर आगे बढ़ता है। ताकि किसी तरह की समस्या का सामना न करना पड़े। और कार्य पूर्ण रूप से चला रहे या समाप्त हो जाए।
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🌞 १. शुभ और अशुभ क्या है?

शुभ का अर्थ होता है — कल्याणकारी, सद्बुद्धि से युक्त, सकारात्मक फल देने वाला कार्य या विचार।
अशुभ का अर्थ है — हानिकारक, दुर्भावनापूर्ण या नकारात्मक परिणाम देने वाला कार्य या विचार।

👉 उदाहरण:

किसी की सहायता करना — शुभ

किसी को हानि पहुँचाना — अशुभ


इस प्रकार शुभ-अशुभ कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि हमारे कर्मों, विचारों और भावनाओं का परिणाम है।
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🌗 २. शुभ-अशुभ कब और क्यों आता है?

यह हमारे कर्मों (Actions) और विचारों (Intentions) से जुड़ा है।

(क) जब हमारा मन सद्भावना, ईमानदारी और सत्य मार्ग पर चलता है,
तो शुभ फल प्राप्त होता है।

(ख) जब मन लोभ, ईर्ष्या, द्वेष या स्वार्थ से भर जाता है,
तो अशुभ परिणाम सामने आता है।

👉 यह उसी तरह है जैसे हम बीज जैसा बोते हैं, वैसा फल पाते हैं।
यदि बीज अच्छा है (सद्कर्म), तो वृक्ष भी फलदायी होगा (शुभ फल)।
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🔥 ३. शुभ-अशुभ कैसे होता है? (कारण और प्रभाव)

शुभ-अशुभ कोई जादू नहीं — यह प्रकृति का नैतिक नियम (Law of Karma) है।

विचार → कर्म → फल
जब विचार शुभ होंगे, कर्म भी शुभ होंगे, और परिणाम भी सुखद होगा।
जब विचार अशुभ होंगे, कर्म भी गलत होंगे, और फल दुखद होगा।
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👉 इसीलिए कहा गया है —

> “जैसा कर्म करेगा, वैसा फल मिलेगा।”

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🌺 निष्कर्ष:

शुभ-अशुभ हमारे मन की दशा और कर्म की दिशा पर निर्भर करता है।
जो व्यक्ति सत्य, प्रेम, धैर्य और करुणा के मार्ग पर चलता है,
उसके जीवन में शुभ समय और शुभ फल स्वतः आने लगते हैं।
और जो व्यक्ति अहंकार, लोभ, ईर्ष्या या अन्याय में लिप्त रहता है,
उसके लिए अशुभ परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।


लेखक - रमेशबाबू


 





कहानी -दो दिल एक जान



दिल्ली शहर की भीड़ में, आरव और काव्या की मुलाक़ात एक सड़क दुर्घटना के दौरान हुई। काव्या एक घायल बच्चे को अस्पताल पहुँचाने की कोशिश कर रही थी, वहीं आरव वहाँ पहले से मौजूद एम्बुलेंस की व्यवस्था कर रहा था। दोनों की नज़रें मिलीं — और जैसे समय ठहर गया।

आरव को काव्या की निडरता पसंद आई, और काव्या को आरव की संवेदनशीलता।
दोनों ने एक-दूसरे के कॉन्टैक्ट लिए, और धीरे-धीरे दोस्ती के रंग रिश्ते में बदलने लगे।
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काव्या का जीवन तेज़ रफ्तार में था — सोशल मीडिया, ब्रांड्स, इवेंट्स और समाज सेवा।
वहीं आरव सादगी में विश्वास रखने वाला था — सुबह की चाय, दादी माँ के संग बातें और काम में ईमानदारी।

दोनों अलग थे, पर एक-दूसरे के बिना अधूरे।
आरव कहता था — “काव्या, तुम मेरी दुनिया को रंग देती हो।”
काव्या मुस्कुराती — “और तुम मेरे दिल को सुकून देते हो।”
लेकिन हर कहानी में एक मोड़ आता है।
काव्या के करियर के लिए उसे विदेश जाना पड़ा।
आरव उसे रोकना नहीं चाहता था, लेकिन दिल से टूट गया।
दादी माँ ने कहा — “बेटा, सच्चा प्यार वही होता है जो उड़ने की आज़ादी दे, बाँधने की नहीं।”

काव्या विदेश चली गई, लेकिन दिल में आरव था।
वो हर सफलता के बाद, हर फोटोशूट के बाद, आरव का नाम अपने दिल में दोहराती — “दो दिल, एक जान।”
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छह महीने बाद, एक बरसाती शाम को जब आरव ऑफिस से लौटा, तो दादी माँ ने दरवाज़ा खोला —
और दरवाज़े पर काव्या खड़ी थी, भीगी हुई, पर मुस्कुराती हुई।
उसने कहा — “आरव, मैंने बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ पाया, पर तुम्हारे बिना सब अधूरा था। मुझे अपनी ‘नई ज़िंदगी’ तुम्हारे साथ पूरी करनी है।”

आरव ने बिना कुछ कहे उसका हाथ थाम लिया।
बारिश की बूंदें उन पर गिर रही थीं, और पीछे से दादी माँ ने धीमे स्वर में कहा —
“अब समझ आया, क्यों लोग कहते हैं... दो दिल, एक जान।”


--- लेखक - रमेशबाबू

कहानी - जीवन एक गलियारा



पुराने शहर के बीचोंबीच एक बड़ा सा मकान था — दीवारों पर वक्त के निशान, छत से झरते पुराने रंग, और दरवाज़े जिन पर ज़िंदगी की आहटें दस्तक देती थीं। उस मकान में “गोविंद” नाम का एक बूढ़ा व्यक्ति अकेला रहता था। उसका जीवन अब उस मकान के लम्बे गलियारे की तरह हो गया था — जहाँ कभी बच्चों की हँसी गूंजती थी, अब सन्नाटा पसरा था।

हर सुबह गोविंद धीरे-धीरे उसी गलियारे में टहलता। दीवारों पर टंगी तस्वीरों को देखता — बचपन की, युवावस्था की, पत्नी की मुस्कान, बेटे की स्कूल की ड्रेस में खींची तस्वीर। हर तस्वीर जैसे उसके जीवन के एक मोड़ की कहानी कहती थी।
वह अक्सर बुदबुदाता — “जीवन भी तो एक गलियारा है... जहाँ एक छोर से जन्म लेकर दूसरे छोर पर मृत्यु की ओर बढ़ते जाते हैं।”
एक दिन उस मकान में एक नया किराएदार आया — आरव, एक युवा लेखक। आरव अक्सर गोविंद से बातें करता, उनकी कहानियाँ सुनता। उसे बूढ़े की बातें गहराई से छू जातीं।
गोविंद ने उसे बताया —
“बेटा, इस गलियारे में कदम रखते हुए लोग आते-जाते रहते हैं। कुछ रिश्ते बीच में रुकते हैं, कुछ आगे निकल जाते हैं। लेकिन अंत में हर कोई अपने कमरे की चौखट तक पहुँच जाता है, जहाँ सिर्फ़ सन्नाटा और यादें होती हैं।”

आरव ने पूछा — “तो क्या गलियारा दुख का प्रतीक है?”
गोविंद मुस्कुराया — “नहीं बेटा, यह जीवन का रास्ता है। इसमें उजाले भी हैं, अंधेरे भी। फर्क सिर्फ़ इतना है कि हम किस ओर देखते हैं — दीवारों के निशान पर या खिड़की से आती रोशनी पर।”
दिन बीतते गए। एक सुबह आरव ने देखा — गोविंद का दरवाज़ा आधा खुला था, कुर्सी पर उनकी चश्मा रखी थी, और गलियारे के दूसरे छोर पर रोशनी फैली हुई थी।
गोविंद अब उस गलियारे से गुजर चुका था — जहाँ से लौटकर कोई नहीं आता।

लेखक - रमेशबाबू

कहानी - मतलबी दुनिया

स्वयं पर विश्वास क्यों?

स्वयं पर इतना विश्वास रखो कि तुम जिस कार्य को करने का निश्चय करते हो, उसे पूर्ण करके ही छोड़ो। क्योंकि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति ...

कहानी = मतलबी दुनिया नारी विशेष