https://rameshbaba7568.blogspot.com/sitemap.xml google-site-verification=kmYBgHhvuQYehft3SXRCNzxbwQDUmaBHZ5DthL_AOrA https://rameshbabu7568.blogspot.com/2024/01/blog-post.html google.com, pub-8003236985543245, DIRECT, f08c47fec0942fa0 life thinking

Life Thinking

rameshbabu7568.blogspot.com

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

कहानी-“बिगड़ी संतान”

शहर से दूर काली सिंधी नदी के किनारे, हरी-भरी पहाड़ियों के बीच बसा था रामपुर नामक छोटा-सा सुंदर गांव। यह गांव अपनी उपजाऊ जमीनों, लहलहाते खेतों और खुशहाल वातावरण के लिए प्रसिद्ध था। यहां के लोग मेहनती, धार्मिक और एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देने वाले थे।

इसी गांव में श्याम और राधा नाम के एक दंपति रहते थे। दोनों के पास खेती-बाड़ी, पशुधन और घर-संसार की कोई कमी नहीं थी, बस एक ही कमी सालों से उन्हें खाए जा रही थी—संतान की कमी।
Ad

श्याम और राधा ने हर उपाय किया—मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाया, व्रत रखे, पंडितों और ओझाओं से पूजा करवाई—परंतु वर्षों तक उनकी गोद सूनी रही। समय बीतता गया, और दोनों की उम्र ढलने लगी। जब सारी उम्मीदें लगभग समाप्त होने लगीं, तभी भगवान ने उनकी सुन ली—राधा ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया।

उन्होंने उसका नाम रखा रघु।
रघु के जन्म से श्याम और राधा के जीवन में जैसे नया प्रकाश आ गया। उनकी दुनिया उसी के इर्द-गिर्द घूमने लगी। मां राधा अपने बेटे पर जान छिड़कती, और पिता श्याम भी उसे खूब प्यार करते। परंतु जब रघु गलती करता या शरारतें करता, तो श्याम उसे डांट देता, जबकि राधा हमेशा उसे बचा लेती।

राधा का अत्यधिक दुलार रघु को बिगाड़ने लगा।
जहां श्याम अनुशासन में विश्वास रखता था, वहीं राधा को लगता था कि “बच्चे को प्यार से समझाना चाहिए।” यही प्यार धीरे-धीरे रघु को गलत राह पर ले गया।
समय बीता, और रघु जवान हुआ। अब उसमें अहंकार और उद्दंडता बढ़ने लगी। वह दोस्तों के साथ देर रात तक मौज-मस्ती करता, शराब और नशे की लत लग गई। घर में आए दिन झगड़े होने लगे।
Ad

श्याम उसे समझाने की बहुत कोशिश करता, पर रघु हर बात को अनसुना कर देता। वह कहता —

> “बूढ़े हो गए हो बाबा, अब मुझे मत सिखाओ कि क्या सही है और क्या गलत।”



श्याम का दिल टूटने लगा। वह अक्सर राधा से कहता —

> “देख लिया तुम्हारे प्यार का नतीजा? आज यह हमें ही आंख दिखा रहा है।”



पर राधा आज भी बेटे का पक्ष लेती और कहती —

> “अभी जवान है, सुधर जाएगा, समय लगेगा।”
लेकिन रघु सुधरने के बजाय और बिगड़ता गया।
वह गांव के लोगों से झगड़ता, खेतों की फसलों पर ध्यान नहीं देता, और दिन-रात शराब और शोरगुल में डूबा रहता। धीरे-धीरे श्याम की तबीयत गिरने लगी। चिंता और दुःख ने उसे भीतर से तोड़ दिया।

एक दिन जब श्याम ने रघु को शराब के नशे में अपने ही पिता से गाली-गलौज करते देखा, तो उसका दिल भर आया। वह चुपचाप बरामदे में बैठा बोला —

> “जिस संतान के लिए हमने भगवान से मन्नत मांगी, वही आज हमारा दुख बन गई।”



कुछ ही महीनों बाद श्याम का निधन हो गया। राधा पूरी तरह टूट गई, लेकिन रघु पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वह पहले से भी अधिक लापरवाह हो गया। खेत बिक गए, घर गिरवी हो गया, और जो कुछ बचा था, वह भी नशे की भेंट चढ़ गया।

अंततः एक दिन जब रघु सड़क पर नशे में बेसुध पड़ा था, तो गांव वालों ने उसे उठाकर घर पहुंचाया। मां राधा ने रोते हुए कहा —

> “जिसे सर पर चढ़ाया था, वही आज मुझे ज़मीन पर गिरा गया।”
Ad



अब रघु को अपने किए पर पछतावा होने लगा। पिता की डांट और सच्ची चिंता आज उसे याद आने लगी। मगर अब बहुत देर हो चुकी थी।

"समाप्त"

विश्वास और स्वार्थ का संबंध !

मनुष्य अपने जीवन में हर किसी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करता। यहाँ तक कि जिन लोगों से वह रोज़ मिलता-जुलता है, उन पर भी नहीं। उसके मन में हमेशा यह डर बना रहता है कि न जाने कब, कहाँ या किस परिस्थिति में कोई व्यक्ति ऐसा अनुचित कार्य कर दे, जिससे बाद में उसे पछताना पड़े।

परंतु यह भी एक अटल सत्य है कि जो व्यक्ति आँखें मूँदकर किसी दूसरे पर विश्वास करता है, वह वास्तव में अपने समान दूसरे को भी ईमानदार और सच्चा मानता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सामने वाला व्यक्ति उस विश्वास पर खरा उतरेगा ही — यह तो केवल समय ही बता सकता है।
Ad

जो व्यक्ति किसी के विश्वास पर खरा उतरता है, वह समाज में वह स्थान प्राप्त करता है जहाँ हर कोई नहीं पहुँच पाता। वहीं, अधिकतर लोग स्वार्थी प्रवृत्ति के होते हैं। वे इस अवसर की प्रतीक्षा में रहते हैं कि कब कोई उन पर विश्वास करे, ताकि वे अपने स्वार्थपूर्ण कार्यों को पूरा कर सकें।

लेकिन ऐसे लोग यह नहीं समझते कि जिसने उन पर विश्वास किया है, वह केवल भरोसा नहीं कर रहा — वह उनकी परीक्षा भी ले रहा है कि वे वास्तव में कितने योग्य और ईमानदार हैं।

स्वार्थ व्यक्ति को लोभी बनाता है, जबकि परस्वार्थ (निःस्वार्थता) उसे परोपकारी बनने का मार्ग दिखाता है। परंतु इस मार्ग पर चलना आसान नहीं होता, क्योंकि इसके लिए व्यक्ति को अपना समय देना पड़ता है और अपने लाभ की भावना से ऊपर उठना पड़ता है। यही कारण है कि हर व्यक्ति इस मार्ग को अपनाने का साहस नहीं कर पाता।
Ad

स्वार्थ और परस्वार्थ – ये दोनों जीवन के दो पहलू हैं। जब तक जीवन है, ये दोनों एक साथ चलते रहेंगे।

''मेरे विचार''

कहानी - बेरंग जीवन।

शहर के एक पुराने मोहल्ले में गोविंद प्रसाद नाम का व्यक्ति अपनी पत्नी शांति और दो बच्चों के साथ रहता था। कभी गोविंद का जीवन रंगों से भरा हुआ था — सरकारी नौकरी, हँसता-खेलता परिवार और आस-पड़ोस में अच्छी इज़्ज़त। लेकिन समय की करवट ने सब कुछ बदल दिया।

सेवानिवृत्ति के बाद जैसे ही आय का स्रोत बंद हुआ, घर के खर्चों ने धीरे-धीरे उसके रंग छीनने शुरू कर दिए। बच्चों की पढ़ाई, बिजली-पानी के बिल, दवाइयाँ — सब कुछ उसकी पेंशन से पूरा नहीं हो पाता। शांति हर महीने हिसाब लगाते हुए परेशान हो जाती और कभी-कभी दोनों में छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा हो जाता।
Ad

गोविंद का बेटा अमित, जो कभी अपने पिता का गर्व था, नौकरी की तलाश में शहर-शहर भटकता रहा लेकिन किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया। वहीं बेटी रीमा, जो पढ़ाई में होशियार थी, समाज की संकीर्ण सोच के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रह गई। “लड़की को इतना पढ़ाने की क्या जरूरत?” — यह सोच उनके ही रिश्तेदारों ने बार-बार दोहराई, और धीरे-धीरे उस घर में उम्मीद की जगह मायूसी ने ले ली।
आर्थिक तंगी के साथ-साथ सामाजिक ताने भी कम न थे। जो लोग पहले नमस्ते करते थे, अब राह बदल लेते। मोहल्ले में नया घर बनाने वालों की चकाचौंध देखकर गोविंद के दिल में कसक उठती। उसे लगता जैसे जीवन के सारे रंग दूसरों की दीवारों पर चिपक गए हों, और उसका घर धूल से ढका कोई पुराना चित्र बन गया हो।
Ad

एक दिन रीमा ने पास के स्कूल में ट्यूशन पढ़ाने का काम शुरू किया। कुछ पैसों की आमदनी हुई तो घर में थोड़ा सुकून लौटा। उसी ने अपने पिता से कहा —
“बाबूजी, जीवन तब तक बेरंग नहीं होता जब तक हम खुद रंग भरना बंद न करें।”

उसकी बात गोविंद के दिल में उतर गई। उसने अपनी पुरानी आदत — बच्चों को पढ़ाना — फिर शुरू की। धीरे-धीरे मोहल्ले के बच्चे उसके पास आने लगे। गोविंद का घर फिर से हँसी और रौनक से भर गया।
Ad

समय बीता, और वह “बेरंग” जीवन फिर से रंगीन हो उठा — न पैसों से, न वैभव से, बल्कि समझ, मेहनत और अपनापन के रंगों से।


जीवन का आधार - पति-पत्नी का रिश्ता


जीवन में पति-पत्नी का रिश्ता सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण संबंधों में से एक माना जाता है। यह रिश्ता केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं, दो परिवारों और दो संस्कृतियों का मिलन होता है। इसमें प्रेम, विश्वास, त्याग, सहनशीलता और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना होती है। पति-पत्नी का संबंध जीवन की राह में साथी बनकर सुख-दुख, हँसी-आँसू और हर परिस्थिति में एक-दूसरे का साथ निभाने का वचन देता है।

यह रिश्ता किसी किताब या शिक्षा से नहीं सीखा जाता, बल्कि इसे समझने और निभाने के लिए हृदय की सच्चाई और समर्पण की आवश्यकता होती है। लेकिन आज के समाज में कुछ ऐसे स्त्री-पुरुष भी हैं जिन्होंने इस पवित्र बंधन को कलंकित किया है। उनके स्वार्थ, अहंकार या अविश्वास के कारण इस रिश्ते की मर्यादा को ठेस पहुँची है। ऐसे उदाहरण हम आए दिन अखबारों और टीवी न्यूज़ में देखते-सुनते रहते हैं, जहाँ आपसी मतभेद, झगड़े या विश्वासघात के कारण यह सुंदर संबंध टूट जाते हैं।

फिर भी, सच्चे अर्थों में पति-पत्नी का रिश्ता वही है जिसमें दोनों एक-दूसरे की कमजोरियों को स्वीकार कर, एक-दूसरे का साथ देते हैं। यही रिश्ता जीवन को पूर्णता और स्थिरता प्रदान करता है। जब यह रिश्ता प्रेम, विश्वास और समझदारी पर आधारित होता है, तब परिवार और समाज दोनों मजबूत बनते हैं। Ad

निष्कर्ष:
पति-पत्नी का रिश्ता जीवन का आधार है। इसे निभाना एक कला है, जिसे केवल सच्चे मन, निष्ठा और विश्वास से ही जिया जा सकता है। यही संबंध जीवन को सुंदर, सुखद और सार्थक बनाता है।

गलत कदम स्वयं ब परिवार को मुसीबत -

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने जीवनकाल में अनेक प्रकार की परिस्थितियों का सामना करता आया है — चाहे वह सामाजिक हो, पारिवारिक हो या आर्थिक। जीवन के हर चरण में संघर्ष और चुनौतियाँ बनी रहती हैं। इन्हीं संघर्षों से मनुष्य का अनुभव, समझ और व्यक्तित्व आकार लेता है।
प्रेम संबंधों में असफलता या आपसी विवाद होने पर कुछ युवक-युवतियाँ इतने विचलित हो जाते हैं कि वे आत्मघाती कदम उठा लेते हैं या हिंसक मार्ग अपनाते हैं। यह अत्यंत दुःखद और चिंताजनक स्थिति है। एक गलत निर्णय न केवल व्यक्ति का जीवन नष्ट करता है, बल्कि उसके परिवार को भी गहरे दुःख और सामाजिक उलझनों में डाल देता है।

समस्याओं का समाधान कभी भी आवेश या क्रोध से नहीं होता। जीवन में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं। यदि व्यक्ति धैर्य, संयम और विवेक से काम ले, तो हर कठिन परिस्थिति से बाहर निकला जा सकता है। परिवार और समाज का भी कर्तव्य है कि वे युवाओं को सही मार्गदर्शन दें, ताकि वे भावनाओं के अंधेरे में भटक न जाएँ।

अतः यह आवश्यक है कि मनुष्य हर परिस्थिति में अपने मानसिक संतुलन को बनाए रखे और समस्याओं का सामना साहसपूर्वक करे। गलत कदम उठाने की बजाय समाधान की ओर बढ़े, क्योंकि जीवन अनमोल है और प्रत्येक कठिनाई का उत्तर समझदारी में ही निहित है।


आज के समय में समाज और पारिवारिक जीवन पहले की तुलना में काफी बदल गया है। तकनीकी प्रगति और आधुनिकता ने जहाँ सुविधाएँ दी हैं, वहीं मनुष्य के मानसिक और भावनात्मक जीवन को जटिल भी बना दिया है। विशेष रूप से नई पीढ़ी प्रेम-प्रसंगों और व्यक्तिगत रिश्तों के मामलों में अधिक संवेदनशील हो गई है। युवावस्था में भावनाएँ प्रबल होती हैं, और कई बार लोग भावनाओं में बहकर गलत निर्णय ले लेते हैं।

आइये।इससे संबंधित वास्तविक घटना से आपको रूबरू करवाते।
6 -7 साल पहले की बात है। यानी 2016 एक व्यक्ति जो आपसी पारिवारिक झगड़ों के कारण दरवाजा बंद कर अपने ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा लेता है। और आत्महत्या करने की  कोशिश करता है। घरवालों की सूझबूझ से दरवाजा तोड़कर बचा तो लिया जाता है। और अस्पताल में भर्ती कर दिया जाता है। किंतु दाएं हाथ की तीन उंगलियां बायें हाथ दो उंगलियां, पैरों की दो-तीन उंगलियां, कान आदि  जलने से खराब होने के चलते डॉक्टरों द्वारा काटना पड़ा। अपने या दूसरे के द्वारा दिए गए गुस्से के कारण शरीर के कुछ हिस्सों  को खोना पड़ा। 
जिससे कि स्वयं तथा परिवार को शारीरिक मानसिक एवं आर्थिक परिस्थितियों से गुजरना पडा़।
                          
                                  लेखक -  रमेशबाबू
                       

 

कहानी - मतलबी दुनिया

स्वयं पर विश्वास क्यों?

स्वयं पर इतना विश्वास रखो कि तुम जिस कार्य को करने का निश्चय करते हो, उसे पूर्ण करके ही छोड़ो। क्योंकि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति ...

कहानी = मतलबी दुनिया नारी विशेष