मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने जीवनकाल में अनेक प्रकार की परिस्थितियों का सामना करता आया है — चाहे वह सामाजिक हो, पारिवारिक हो या आर्थिक। जीवन के हर चरण में संघर्ष और चुनौतियाँ बनी रहती हैं। इन्हीं संघर्षों से मनुष्य का अनुभव, समझ और व्यक्तित्व आकार लेता है।
प्रेम संबंधों में असफलता या आपसी विवाद होने पर कुछ युवक-युवतियाँ इतने विचलित हो जाते हैं कि वे आत्मघाती कदम उठा लेते हैं या हिंसक मार्ग अपनाते हैं। यह अत्यंत दुःखद और चिंताजनक स्थिति है। एक गलत निर्णय न केवल व्यक्ति का जीवन नष्ट करता है, बल्कि उसके परिवार को भी गहरे दुःख और सामाजिक उलझनों में डाल देता है।
समस्याओं का समाधान कभी भी आवेश या क्रोध से नहीं होता। जीवन में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं। यदि व्यक्ति धैर्य, संयम और विवेक से काम ले, तो हर कठिन परिस्थिति से बाहर निकला जा सकता है। परिवार और समाज का भी कर्तव्य है कि वे युवाओं को सही मार्गदर्शन दें, ताकि वे भावनाओं के अंधेरे में भटक न जाएँ।
अतः यह आवश्यक है कि मनुष्य हर परिस्थिति में अपने मानसिक संतुलन को बनाए रखे और समस्याओं का सामना साहसपूर्वक करे। गलत कदम उठाने की बजाय समाधान की ओर बढ़े, क्योंकि जीवन अनमोल है और प्रत्येक कठिनाई का उत्तर समझदारी में ही निहित है।
आज के समय में समाज और पारिवारिक जीवन पहले की तुलना में काफी बदल गया है। तकनीकी प्रगति और आधुनिकता ने जहाँ सुविधाएँ दी हैं, वहीं मनुष्य के मानसिक और भावनात्मक जीवन को जटिल भी बना दिया है। विशेष रूप से नई पीढ़ी प्रेम-प्रसंगों और व्यक्तिगत रिश्तों के मामलों में अधिक संवेदनशील हो गई है। युवावस्था में भावनाएँ प्रबल होती हैं, और कई बार लोग भावनाओं में बहकर गलत निर्णय ले लेते हैं।
आइये।इससे संबंधित वास्तविक घटना से आपको रूबरू करवाते।
6 -7 साल पहले की बात है। यानी 2016 एक व्यक्ति जो आपसी पारिवारिक झगड़ों के कारण दरवाजा बंद कर अपने ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा लेता है। और आत्महत्या करने की कोशिश करता है। घरवालों की सूझबूझ से दरवाजा तोड़कर बचा तो लिया जाता है। और अस्पताल में भर्ती कर दिया जाता है। किंतु दाएं हाथ की तीन उंगलियां बायें हाथ दो उंगलियां, पैरों की दो-तीन उंगलियां, कान आदि जलने से खराब होने के चलते डॉक्टरों द्वारा काटना पड़ा। अपने या दूसरे के द्वारा दिए गए गुस्से के कारण शरीर के कुछ हिस्सों को खोना पड़ा।
जिससे कि स्वयं तथा परिवार को शारीरिक मानसिक एवं आर्थिक परिस्थितियों से गुजरना पडा़।
लेखक - रमेशबाबू
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