सोहन बड़ा तथा मोहन छोटा था। छोटी ही उम्र में माता - पिता का देहांत हो चुका था। इसलिए सोहन ने खेती के सारे काम जिम्मेदारी अपने ऊपर तथा तथा मोहन को स्कूल में बाद में पास ही के सिटी कॉलेज में पढ़ाई जारी रखवाई ताकि आगे जाकर। अपने पैरों पर खड़ा हो जाऐ। पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहन को शहर की एक जानी-मानी प्राइवेट कंपनी में जॉब मिल गई थी। फिर थोड़े दिन बाद एक लड़की से शादी करने के बाद शहर में ही बस गया था। अभी तक तो दोनों भाई के रिश्ते में किसी बात को लेकर अनबन नहीं हुई थी। लेकिन वह कहते हैं। ना कि रुपया - पैसा लोभ- लालच और स्वयं को दूसरे पर विश्वास न होने वाले रिश्ते ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाते। यही सोहन और मोहन के साथ हुआ। सोहन और मोहन का एक पड़ोसी था। जिसका नाम राघव था जो पक्का चुगलखोर एवं लडाऊ बाज किस्म का आदमी था। मोहन कभी-कभी अपने गांव जाता रहता था। जिससे उसने मोहन के भी कान भर दिए थे। की इतनी फसल निकलती है। आपको फसल में से कम भाग देता है। जिससे उसके मन में अपने भाई सोहन के प्रति ईस्या जनक भाव पैदा हो गए। और सोहन के बहुत समझाने पर भी अपनी खेती का आधा भाग जमीन का राघव के कहने पर एक दूसरे पड़ोसी को बैच दिया। जो की बहुत कम दामों में बिक चुकी थी। जिसमें राघव को भी सोहन की जमीन कम दाम पर दिलाने पर दूसरे पड़ोसी द्वारा पैसा मिला था। जब बाद में सोहन को पता चला। लेकिन अब क्या हो सकता है। जब चिड़िया चुग गई खेत।
कहानी विशेष = व्यक्ति अपने जीवन को दूसरे के द्वारा या अपनों के द्वारा अपने लक्ष्य की तो पूर्ति कर लेता है। किंतु फिर भी उसे व्यक्ति पर दोबारा विश्वास नहीं करता । जिससे वे कई तरह की मुसीबत और आर्थिक मुसीबत का सामना करता है
लेखक - रमेशबाबू